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कतकी पूनो का चांद

लक्ष्मी शर्मा

एक सुबह आँख खुलते ही एक विचार ने भी अपनी आँखें खोल कर अपनी नन्ही चमकीली आँखों से दिमाग के हर कोने को टटोला और वांछित सामग्री न पाकर सीधे-सीधे पूछ लिया- 'हर विधा पर हाथ आजमा लिया, एक निबंध भी लिख लेतीं।'
'निबंध!' सुनते ही हमारी सिट्टी-पिट्टी जाने कहाँ खो गई। निबंध की हिम्मत-हैसियत नहीं हमारी।
न हम हजारी बाबा हैं जो नाखून जैसी न कुछ चीज के व्याज मनुष्य के भीतर जन्मना बैठी आदिम हिंसक प्रवृत्ति से उसके सभ्य होने के प्रयत्नों का विश्लेषण कर दें और न आचार्य रामचंद्र शुक्ल सी गुरु गम्भीर वैचारिकता और अद्भुत सूत्रात्मक प्रबंध कौशल जो गागर में सागर भर दे। न कुबेरनाथ राय हैं जो उत्तरा फाल्गुनी के आस पास-जैसी परिष्कृत भाषा लिख सकें। न ही विद्यानिवास मिश्र जैसी वर्णनात्मक शैली है कि कल्पना की लाठी के सहारे बिना भी किसी स्थान या घटना का वर्णन अद्भुत सजीवता एवं सहजता के साथ कर दें।
'छोड़ो', हृदय ने लेखक का पक्ष लिया।
लेकिन नन्हा विचार दिमाग की शह पाकर निबंध रूपी चन्द्र खिलौने के हठ पर अड़ा रहा।
हे भगवान! कोई निस्तार न पा कर मैंने आसमान की ओर देखा जो अपने भाल पर कतकी पून्यु के बड़े से चाँद की टिकुली लगाए इतर रहा था।
अहा, कतकी पून्यु का चाँद! कहा जाता है कि सारे साल में एक यही दिन है जब प्रसिद्ध पुष्कर सरोवर का पानी आंदोलित हो जाता है, इन्हीं चाँद मियां की करामात से।
एक छुटकू सा, घटता-बढ़ता, बीतता-उभरता उपग्रह जो खुद धरती के मोह में डूबा उसके फेरे खाता रहता है, कैसे इतना बली हो जाता है कि धरती के महाबली तत्व पानी को भी हिला देने की सामर्थ्य पा जाता है। शायद यही रागाकर्षण है जो ब्रह्मांड के या ब्रह्मांडों के कण-कण के हर तत्व, हर उपादानों को आंदोलित करने की सामर्थ्य रखता है।
चाँद ही क्यों, चाँद की परम सखी धरती और धरती के मन मे बसे सूरज जी भी इस से कहाँ मुक्त हैं। अनन्त दूरी पर बसे इस बड़े से तारे के इर्दगिर्द चाहे आठ प्रेमी चक्कर खा रहे हैं, लेकिन ये भी तो जाने किस की आस में अपनी आँच में सीझे-रीझे खुद को बचाए हुए हैं। समर्थ इतने कि क्षण भर में धरती का काल बन जाएं और कोमल इतने कि अपने और पृथ्वी के बीच छुटकू चाँद का आना तक नहीं सह पाते। तुरन्त चेहरा साँवला पड़ जाता है।
जबकि धरती से कई गुना बड़े ग्रह इनके चकफेरे खाते रहते हैं।
बृहस्पति को ही देखिए, विष्णु का प्रतीक ये विशालतम पीला ग्रह, ज्ञान और चेतना का स्वामी माना जाता है। लेकिन सूर्य के मोह में ये अपनी गुरु गरिमा को अंतरिक्ष मे ही विसर्जित कर मौन भाव से बस अपनी आस के पीछे भागते रहते हैं। इतनी तेजी से कि खुद को स्वरूप-परिवर्तन कर चपटा कर लिया। और मज़े की बात इन स्वयं के अस्सी के लगभग आशिक इनकी परिक्रमा करते हैं लेकिन इन के दिल के महान लाल धब्बे (great red spot) में तो कोई और ही बसा है जो बृहस्पति क्या सौंदर्य, कला और काम के स्वामी शुक्र तक से विरक्त बनाए हुए है।
शुक्र, शक्लो-सूरत में धरती की बहन सी लगने वाली, अनिंद्य रूप-राशि, प्रेम, ऐश्वर्य स्वर्ण-हीरक और लीला-विलास धारिणी जिसे वीनस भी कहा जाता है। चंद्रमा के बाद सबसे ज्यादा चमकीला, दूधिया ग्रह। जानता है कि अपने सूर्य से बहुत-बहुत दूर है लेकिन बस दिल में प्रेम-अगन बसाए महबूब के चारों और घूमते रहते हैं। इतनी अगन कि सूरज के अलावा कोई न झेल पाए। सारी दुनिया को अपने प्रभाव से रसिक चंचल बना देने वाले शुक्र का चांचल्य केवल सूर्य के प्रति है इतना कि वह मात्र दो सौ पच्चीस दिनों में एक फेरा पूरा कर लेता है। हालांकि हिन्दू मान्यता के अनुसार ये राक्षसों के गुरु हैं और एकाक्षी हैं, पर इससे इनको कोई अंतर नहीं पड़ता। ये बस अपनी दूधिया अनुरक्ति में खोए रहते हैं इससे निश्चिंत कि उनकी होड़ रतनारे प्रेम में डूबा मंगल भी कर रहा है।
मंगल जो पृथ्वी की तरह एक जीवन-स्पन्दित ग्रह कल्पित किया जाता है, अपनी गुलाबी काया के साथ खूब छटा फैलाता है।
ज्वालामुखी, पानी, बर्फ वाष्प क्या नहीं है इस के दामन में।सौरमंडल का सबसे अधिक ऊँचा पर्वत, ओलम्पस मोन्स और विशालतम कैन्यन वैलेस मैरीनेरिस भी इस की गोद में खेलते हैं, इसके दो चंद्रमा आपस में रक़ाबत करते इसके फेरे लेते हैं लेकिन शक्ति, आवेग और बलशील ये मंगलमुखी अपने भाव में मगन सूरजमुखी बना रहता है। कहने वाले इसे क्रूर भी कहते हैं और दाम्पत्य विच्छेद का कारण भी। लेकिन यह आरक्त मुख लिए बस रहस्यमय मौन में डूबा रहता है।
ठीक ऐसे ही आरक्त चेहरे वाले शनि जी हैं। बांकी छबीली छब वाले जिनके बारह रंगीले छल्ले उन्हें ऐसा अप्रतिम रूपवान बनाते हैं कि टाइटन जैसे सैंकड़ों चाँद उनके आगे पीछे भटकते रहते हैं।
कहने को ये भी गुस्सैल कहलाते हैं, मृत्युदंड धारी यम पुत्र। लेकिन अपने भीतर आग की जगह धैर्य की बर्फ और प्रेम के तूफानी बवंडर दबाए ये बेहद शीतल हैं अर्थात ये सूर्यासक्ति की ठंडी आग में जलते हैं।
सूर्यासक्ति बुध की भी कम नहीं है, इनका प्रेम तो इन्हें अपने प्रिय के सामने अंधा ही कर देता है।
वाक चातुर्य और ज्ञान बुद्धि के प्रदाता माने जाने वाले बुध जी के सूरज से प्रेम को हम इस तरह समझ सकते है कि वे अपने प्रिय से सबसे नजदीकी हैं और सबसे ज्यादा त्वरा से उनके चक्कर काटते हैं। और अनिंद्य समर्पण ऐसा कि ये एकमात्र ऐसा ग्रह है जो सिर्फ सूर्य का ही चक्कर लगाता है, जबकि बाकी सभी ग्रह न चाहते हुये भी अन्य ग्रहों का चक्कर लगाते है। इन्हें चाहे हरा रंग प्रिय हो, ये स्वयं दूधिया और पारे से तरल स्वभाव वाले हैं।

अरुण, या यूरेनस हमारे सौर मण्डल में सूर्य के सातवें अनुरक्त हैं। व्यास के आधार पर सौर मण्डल के तीसरे बड़े ग्रह अरुण बहुत नम्र हैं, इतने कि अपने अक्ष पर लगभग बयासी डिग्री में झुके हुए है और लेटे हुए दिखाई देते हैं इसलिए इसे लेटा हुआ ग्रह कहा जाता है।

हरे रंग के अरुण स्वभाव के आधार पर सबसे शीतल माने जाते हैं। मान्यता है कि किसी अज्ञात निकाय की टक्कर इनकी अधिकांश आद्य गर्मी के निष्कासन का कारण बनी।मज़ेदार संभावना यह भी है कि वो विशाल निकाय शायद सूर्य का ही कोई दिलजला प्रेमी रहा हो और ईर्ष्या में टक्कर मार गया हो।

वरुण शक्ल में अरुण के जुड़वा लगते हैं किंतु अरुण की तुलना में बहुत सुस्त हैं। इन्हें सूरज की एक पूरी परिक्रमा करने में लगभग एक सौ पैंसठ पृथ्वी वर्ष लगते हैं,जिसका कारण इनकी एक लाख दो हजार चार सौ दस खरब अरब की भारी देह है शायद ये कछुए की जीत से प्रेरित हैं। जो भी हो, हल्के नीलाभ वरुण अपने छल्लों के चलते आकर्षक प्रेमी हैं।

इन आठ मुरीदों के अलावा एक बौने ग्रह महोदय भी हैं जिन्हें इनके छोटे कद, बाँकी तिरछी चाल और बाहरी निवास के कारण कभी तो सूर्यासक्तों में शामिल कर लिया जाता है और कभी बिरादरी बाहर कर दिया जाता है। इनकी गति तो अरुण जी से भी ज्यादा ढीली है लगभग दो सौ अड़तालीस पृथ्वी वर्षों में एक चक्कर पूरा करने वाले ये महोदय दुरंगे नहीं किसी दिलफेंक रसिक की तरह बहुरंगी भी है।

लेकिन ये सब पृथ्वी के आगे कहीं नहीं ठहरते। नीले संगमरमर सी पृथ्वी के सूरज से प्रेम और विश्वास की पराकाष्ठा है कि वो मान कर चलती है कि उसका प्रिय अपना श्रेष्ठ केवल उसी को देगा और इसी भरोसे में उसने मनुष्य, मनुष्येतर और अगणित वनस्पति प्रजातियां अपनी कोख से प्रसूत कर दी हैं। और प्रिय ने उसके विश्वास को तोड़ा भी नहीं, वो धरा के हर प्राणी, हर तत्व को अपनी ऊष्मा और प्राणवायु से सिंचित करता रहता है।

ये बात अलग है कि इस सब के बाद भी चाँद इसके पानी को ही नहीं मनुष्यों के मस्तिष्क में विद्यमान तरल को भी प्रभावित कर देता है। ये भी प्रेम की सामर्थ्य है चाहे इकतरफा ही क्यों न हो।

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