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हॉकी के नाम पर रोना क्यूं

राष्ट्रीय खेल की दुर्गति का नया रिकॉर्ड, हॉकी के खेल में जुड़ा काला अध्यायआदि-आदि अनेक हैडलाइन आज के समाचार पत्र की भारी भरकम सुर्खियां में शामिल हैं। वास्तव में ही यह एक शर्मनाक  प्रदर्शन है या फिर क्रिकेट के देश में प्रोत्साहन के अभाव में हॉकी की दुर्दशा की मार्मिक कहानी। इस बारे में सबका अपना-अपना नजरिया हो सकता है। लेकिन सत्य यही है कि हॉकी भले ही सरकारी दस्तावेजों में राष्ट्रीय खेल हो मगर इस खेल की लोकप्रियता देश में ही कितनी है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। हॉकी के साथ सदैव ही दोयम दर्जे का व्यवहार होता आया है। इसकी साख को कभी भी चमकाने का प्रयास नहीं किया गया, कागजी कार्यवाहियों या व्यर्थ की बयानबाजी को छोड़कर।

आज कमसे कम इस बात की खुशी तो हो रही है कि प्राय सभी समाचारपत्रों के मुखपृष्ट पर भारतीय हॉकी की दुर्दशा पर लम्बे-चौड़े व्यक्तव्य छपे हैं। देश के मीडिया का यह रूप कई लोगों को सराहनीय लग सकता है कि राष्ट्रीय खेल में आ रहे पतन के लिए वो जागरूक है। परंतु यह मीडिया की जागरूकता कम उसकी मजबूरी है। चूंकि देश में इस समय कोई क्रिकेट सीरीज नहीं चल रही और न ही क्रिकेट टीम किसी देश के दौरे पर है। इसलिए मीडिया को कुछ तो दिखाना या छापना ही है तो विश्व कप क्वालीफांइग मैच में ब्रिटेन के हाथों मिली हार को ही क्यों ना भुनाया जाए। इन विचारों को अन्यथा भी लिया जा सकता है परंतु सच यही है। निसंदेह यदि क्रिकेट की कोई सीरीज चल रही होती तो समाचार पत्रों में दो-तीन कॉलम से अधिक की जगह इस समाचार को नहीं मिलती। अथवा क्या कारण हो सकता है कि क्रिकेट अथवा टेनिस खिलाड़ियों को छोड़कर कभी भी ऑफ सीजन में हॉकी खिलाड़ियों का जिक्र तक नहीं होता । कभी किसी हॉकी खिलाड़ी को हाईलाइट नहीं किया जाता, उनके इंटरव्यूह एक्सक्लूसिव के ठप्पों के साथ चैनलों पर नहीं चलते। और तो और शायद बहुत कम लोगों को पता हो कि हॉकी टीम का कप्तान कौन है।

कमोबेश यही स्थिति देश के नेताओं की भी है। ऑस्ट्रेलिया में क्रिकेट सीरीज जीतने के बाद प्रधानमंत्री, राश्ट्रपतिजी सहित सभी ने जीत पर खिलाड़ियों को बधाई दी परंतु हॉकी की इस दुर्दशा में किसी नेता या राज्य सरकार ने इस बात की घोषणा नहीं की वो अपने-अपने स्तर पर हॉकी को प्रोत्साहन देने का कार्य करेंगे। संभवत एक मात्र कांग्रेस पार्टी के महासचिव राहुल गांधी ने हॉकी संबंध में कोई टिप्पणी की है।

जिस देश में हॉकी को प्रोत्साहित करने की जगह खिलाड़ियों को यह कहा जाए कि विपक्षी टीम द्वारा उन पर गोल करने पर जुर्माना लगेगा ऐसे में खेल का स्तर किस प्रकार सुधेरगा स्वयं ही समझा जा सकता है।

वास्तव में हॉकी की दुर्दशा का जिम्मेवारी किसी पर नहीं थोपी जा सकती। हां ऐसे अवसर में शाहरूख अभिनित फिल्म  चक दे इंडिया का एक संवाद बरबस याद आता है कि इस देश में कोई खेल खेलना है तो क्रिकेट खेलो। यदि उक्त फिल्म में उठाए गए मुद्दों को आज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो सहज ही समझ आ जाता है कि हॉकी की यह व्यथा नई नहीं है। हॉकी में सुधार के लिए भले ही इंस्टेंट कॉफी की तरह कार्यवाही न की जा सकती हो मगर इसके सुधार के लिए बीरबल की खिचड़ी पकाने का उपक्रम भी व्यर्थ है। ऐसी स्थिति में यही आशा करनी चाहिए की इस हार के बाद हॉकी को बचाने के लिए एक सार्थक पहल मीडिया, सरकार ,आईएचएफ तथा देश के तमाम बड़े प्रायोजकों द्वारा की जाएगी।

-अरविन्द सारस्वत
अप्रेल 30, 2008

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