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जन्म एक लक्ष्मी का हमारा समाज ने चाहे कितनी भी उन्नति कर ली है, चाहे हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं लेकिन सोच आज भी पुरानी ही है। खासकर लड़कियों के बारे में तो नहीं बदली। यह घटना तो मेरे साथ घटी है। मेरी एक बेटी है जिसका नाम निधि है। मैं उसे बहुत प्यार करता हूँ। मेरे यहाँ पिछले महीने एक और बेटी ने जन्म लिया। मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बेटी है या बेटा। बस मैंने तो यही सोचा कि निधि अकेली न रहे। मुझे दुख तब हुआ जब मैंने उसके जन्म की सूचना अपने परिवारीजनों, रिश्तेदारों तथा दोस्तों को दी। मैंने जिसे भी फोन किया उसने ऐसे जवाब दिया जैसे कि उसका बहुत बड़ा नुकसान हो गया हो। जो जवाब मुझे मिले मैं उन्हें यहाँ लिख रहा हूँ। किसी ने कहा चलो कोई बात नहीं है, कहीं से जवाब मिला लक्ष्मी आई है, कोई कहता है अरे लड़का होता तो कुछ और ही बात होती, कोई बात नहीं अगली बार लड़का होगा जैसे कि वो साहब कोई पहुँचे हुए ज्योतिषी हों। एक साहब ने तो हद ही कर दी उन्होंने ने कहा अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे। और एक निष्ठुर जवाब क्या पहले अल्ट्रासाउण्ड नहीं कराया आजकल तो इस समस्या का हल मौजूद है। किसी ने कहा कि मुझसे मिलते तो लड़का होने की दवाई दिलवा देता। सच मानिए मेरी खुशी रफूचक्कर हो गई इसलिए नहीं कि इन जवावों से अपनी फूल सी बेटी के प्रति मेरा नजरिया बदल गया हो। वह इसलिए कि आखिर लड़की को इतना बड़ा बोझ आज भी क्यों माना जाता है और मैंने फिर किसी को फोन करना उचित नहीं समझा। आखिर लड़का ही क्यों। आखिर इन लोगों से मैं यही पूछना चाहता हूँ कि आज कितने लड़के अपने बुजुर्ग माता पिता की बुढ़ापे की लाठी हैं? वे कितना उनका खयाल रखते हैं कितनी वे सेवा करते हैं। चाहे रोजी रोटी के लिए ही मैं अपने माता पिता से दूर हूँ चाहकर भी मैं उनके साथ नहीं रह पा रहा। फिर हम क्यों लड़को की इतनी चाहत रखते हैं।
मैं अपनी दोनो बेटियों को
बहुत प्यार करता हूँ और मुझे लड़के की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन मैं इस
घटना के माध्यम से इस शिक्षित और आधुनिक समाज से यही पूछना चाहता हूँ कि एक
माँ को जन्म के समय लड़का कम और लड़की अधिक तकलीफ देती है
? मैं जानता हूँ इस निष्ठुर समाज के पास मेरे सवालों का कोई जवाब शायद ही हो। जो भी हो मेरे लिए मेरी दोनों बेटियां लक्ष्मी ही है। हरीश कुमार
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