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कभी खुशी कभी गम
पारिवारिक मूल्यों पर एक रोचक फिल्म

करण जौहर के आत्मविश्वास‚ पिता के लम्बे अनुभव और सपनों को सच कर दिखाने की चाह का परिणाम है यह फिल्म। एक उद्योगपति भारतीय परम्परावादी परिवार के मूल्यों पर बनी यह साफ सुथरी भावनात्मक फिल्म कुछ अच्छे मुद्दों को उठाती है। पिता – पुत्र के कश्मकश भरे सम्बंध तो हैं ही‚ साथ ही पति का पत्नी पर अपने प्रभाव का लगातार फायदा उठाना आदि प्रश्नों को निर्देशक ने खूबसूरती से उकेरा है।

पति पत्नी के पात्र में अमिताभ और जया ने बहुत स्वाभाविक अभिनय किया है। पति के अहम और प्रभाव में बस " कह दिया न बस! "  कह देने मात्र से अपनी ममता को विवश कर कई वर्ष अपने बच्चे से अलग बिता लेती है। जबकि पति स्वयं अपने ही अहम से त्रस्त बेटे के अपने आप लौट आने की राह देखता है। पर अहम दूरियां बढ़ा लेते हैं।

बेटे और बहू के किरदार में काजोल और शाहरुख का अभिनय अच्छा रहा। काजोल ने चांदनी चौक की मध्यमवर्गीय चुलबुली नितान्त भारतीय लड़की के किरदार में अपने सहज अभिनय से जान डाल दी है। शाहरुख ने दत्तक पुत्र की विवशताओं और प्रेम के असमंजस को बहुत बारीकी से प्रस्तुत किया है। ऋतिक रोशन छोटे भाई के रूप में सहज लगे हैं और करीना इस फिल्म में साधारण रही। उसके रोल में नाच कूद और ग्लैमर के अलावा बस परिवार को मिलाने का माध्यम बनने के अतिरिक्त अभिनय की कोई गुंजाईश नहीं थी। गीतों की अधिकता समय की मांग है‚ पर इस फिल्म के कुछ गीत ही लोकप्रिय हुए हैं।

हालांकि इस बड़े बजट की शानदार फिल्म में यश चोपड़ा और स्वयं करन जौहर की कई फिल्मों के प्रतिबिम्ब झलकते हैं पर उसे निर्देशक की छाप कहा जा सकता है। कुल मिला कर यह फिल्म इस वर्ष की शानदार और सफल फिल्म मानी गई है।

– मनीषा कुलश्रेष्ठ

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