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भारत की तुष्टिकरण की नीति

न भारत‚ न पाकिस्तान कोई नहीं चाहता युद्ध। न भारतीय जनता चाहती है युद्ध न ही पाकिस्तानी अवाम। बहुत मँहगा सौदा है यह युद्ध‚ ज़िन्दगियों का‚ देश की गाढ़ी कमाई का‚ और चैनो अमन का सौदा। दोनों देशों में से कोई नहीं चाहता विकास के दसियों साल पीछे चले जाना और युद्ध का अर्थ यही है। लेकिन मुस्लिम कट्टरपंथियों और आतंकवाद ने युद्ध की सोच को शह दी है और इस आतंकवाद की एक और चिनगारी युद्ध की आग भड़काने के लिये काफी होगी। माना कि यह ज़रूरी नहीं जो आतंकवाद पाकिस्तान में पनप और बढ़ रहा है‚ उसे देश की सरकार का सहयोग प्राप्त हो ही। माना कि धार्मिक दबावों की वजह से बहुत बार इसे उन्हें उपेक्षित करना पड़ा हो…पर अंततÁ यह जानबूझ कर या विवशता में दी गई शह पाकिस्तान को मंहगी पड़ी है और उसकी हालत साँप के मुंह में छछूंदर जैसी हो गई है जो न उगलते बनता है न निगलते।

भारत की स्थिति भी कोई बहुत अच्छी नहीं‚ मदरसों और धार्मिक कट्टरवादिता के रूप में यह जो आतंकवाद भारत की आस्तीन का साँप बन बैठा है‚ और जब चाहे अपना विष भरा फन खोल देता है वह पिछले पचास वर्षों से चलती आ रही भारतीय सरकारों की 'तुष्टिकरण की नीति' का परिणाम है। धार्मिक सहिष्णुता या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ "तुष्टिकरण" या खुशामद कतई नहीं हो सकता। पर गाँधी जी से शुरु होकर‚ नेहरु‚ इंदिरागांधी और अब अटल जी ने भी यही रवैय्या अपनाया है‚ जो कि आरंभ से ही गलत रवैय्या था। सरकार द्वारा मुस्लिम समुदाय को बराबरी का दर्जा देना सही है‚ मगर विशेष दर्जा देकर सर पर बिठाना गलत रवैय्या है।अब यह हाल है कि भारतीय मुस्लिम मदरसों में ' इस्लाम खतरे में है' का नारा नासूर बन गया है। हमारे ही विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले मुस्लिम युवक आतंकवादियों को हमारे ही देश में हमें ही नष्ट करने के लिये राह दिखा रहे हैं।

हमारे राजनैतिज्ञ अपने राजनैतिक स्वार्थ के तहत किसी न किसी 'गरीब'‚ 'दलित' या अल्पसंख्यक वर्ग की तलाश में रहते हैं। क्योंकि ये वोट बैंक हैं। वे इन्हें मुख्यधारा में क्यों नहीं शामिल करते‚ देश के आम नागरिक का अधिकार क्यों नहीं देते? ये व्यर्थ की खुशामद क्यों? क्या यही खुशामद उन्हें आम जनता से अलग थलग नहीं कर देती? महज कुछ वोटों के लिये देश के भविष्य से खिलवाड़ करने का अधिकार इन्हें किसने दिया? क्या अब संभव है कि इस तुष्टिकरण की नीति पर अमल किये बिना कोई सरकार बहुमत हासिल कर सके?

यह खुशामद अब देश की जड़ों में दीमक की तरह लग गई है। और आज हमारे सर पर फन फैलाए खड़ा आतंकवाद इसी 'तुष्टिकरण की नीति' का परिणाम है। एक आम भारतीय मुसलमान अपने आपको मुख्यधारा का हिस्सा नहीं समझता‚ वह अलग थलग चलना चाहता है‚ अपने धर्म को ही अपना कानून मानता है। यही वजह है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ और शरीया के नियम हमारी भारतीय कानूनी प्रक्रिया में रोड़ा अटकाते आए हैं।

भारत में तो धर्म और संस्कृतियों की कमी नहीं और हर धर्म की अपनी आचार संहिता होती है किन्तु वह भारतीय संविधान की महत्ता को कम नहीं कर सकते। किन्तु तुष्टिकरण की इस नीति के चलते बहुत पहले से चाह कर भी भारतीय जनता पार्टी 'कॉमन सिविल कोड' को लागू न कर सकी। क्योंकि फिर सत्ता में आते ही वोट का सवाल आ खड़ा हुआ। कॉमन सिविल कोड का अर्थ कि मुस्लिमों को असंतुष्ट करना। और बस यही वजह है कि हम कितना ही तालेबानों का विरोध कर लें हमारे स्वयं के संविधान पर धर्मों के अपने अपने कानून हावी हैं।

धार्मिक निरपेक्षता का यह अर्थ कभी नहीं था जो आज है‚ धार्मिक निरपेक्षता के अर्थ को अब इस कदर तोड़ मरोड़ दिया गया है कि और हम इस रवैय्ये को एक दम से बदल पाने में असमर्थ हैं। हम चाह कर भी मुसलमानों को मुख्यधारा से जोड़ नहीं पाते‚ वे इस कदर धार्मिक असिहष्णुता से ग्रस्त हैं कि बात बात पर क्रुद्ध हो जाते हैं हर ऐसी कानूनी गतिविधि पर उन्हें लगने लगता है कि 'इस्लाम खतरे में है।' उनके शिक्षा स्तर में कमी और धार्मिक असिहष्णुता ही उन्हें मुख्यधारा से अलग किये हुए है अन्यथा पाकिस्तान से ज्यादा मुसलमान तो भारत में हैं। मुस्लिम इमाम और उलेमा भी आज राजनीति में दखल रखते हैं‚ ये धार्मिक राह दिखाने वाले धर्मगुरु यह बताते हैं कि वोट किसे दिया जाए। राजनीति पर धर्म बुरी तरह हावी हो चला है।
संविधान बनाते समय आर्टिकल 44 में यह लिखा गया था कि भविष्य में आम नागरिक के लिये एक यूनिफॉर्म सिविल कोड निर्धारित किया जाएगा और उसके तहत सभी पर एक से नियम लागू होंगे। जिसमें उनकी धार्मिक भावनाओं का भी ख्याल रखा जाएगा। किन्तु ऐसा समय आया ही नहीं आज 52 वर्षों बाद भी कि कोई सरकार यह साहस न कर सकी ऐसा कदम उठाने के लिये कि हर धर्म की अपनी आचारसंहिता की अच्छाईयों को अछूता रख सबके हित में एक ऐसा यूनिफार्म सिविल कोड बना कर लागू हो जो सभी धर्मों से उपर हो जिसे सभी भारतीय नागरिक मानें बिना किसी विवाद के।
अब समय आ गया है कि भारतीय मुसलमानों को मुस्लिम पर्सनल लॉ में कुछ बदलाव लाने चाहिये‚ आज के परिवेश‚ समय और भविष्य को ध्यान में रख कर तथा राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल हो जाना चाहिये क्योंकि वे एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के नागरिक पहले हैं।
 

– राजेन्द्र कृष्ण

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