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आदिवासी महिलाओं की आजीविका
का साधन बना
'मछलीपालन'

वीमेन्स फीचर सर्विस

चेन्नई (विमेन्स फीचर सर्विस) : कुछ इरुलार (तमिल में इरुल का अर्थ अंधेरा होता है) अंधेरे से निकल कर प्रकाश की ओर आ गए हैं। तमिलनाडु के इस समुदाय का नाम इरुलार इसलिए पड़ गया है क्योंकि इनकी जिंदगियां अंधेरे से जुड़ी हैं। सदियों से ये लोग सांपों और चूहों को पकड़ते आ रहे हैं। सांप, चूहे, कछुए और यहां तक कि घोंघे भी इन लोगों का आहार रहे हैं। 

आधुनिक कानून और वन्य जीव अधिनियमों ने इनसे इनकी पारंपरिक रोजी-रोटी और भोजन का जरिया छीन लिया है। आज तमिलनाडु भर में जगह-जगह बिखरे ये लोग घोर दरिद्रता में अपने दिन काट रहे हैं। लेकिन चेन्नई गांव के निकट पेरुंगुलाथुर गांव के ये उद्यमी इरुनार अब आत्मनिर्भरता और सामाजिक मान्यता के मार्ग पर चल निकले हैं। इन्होंने अपने आप को नए सिरे से खोज निकाला है। इस सकारात्मक बदलाव के पीछे हाथ महिलाओं का है जिन्होंने 'पौरनामी इरुलार महिला स्व-सहायता समूह' बना लिया है। 

अब इनका ध्यान सांपों के बजाय मछलियों की ओर है, और वह भी मंहगी रंग-बिरंगी सजावटी मछलियों की ओर। चमकदार गप्पी, फाइटर फिश, सुनहरी मछलियां, रोज़ी बार्ब, सफेद मौली, रेड शो टेल्स तथा दूसरी आकर्षक मछलियां इन महिलाओं के घरों में सीमेंट की टंकियों में फुर्ती से तैरती नज़र आती हैं। पिछले पांच सालों से मछलियां पालना और उन्हें बेचना इन महिलाओं की आजीविका का साधन बना हुआ है। यह समूह आमदनी को आपस में बांट लेता है और इसके ग्राहक बार-बार इन्हीं के पास खरीददारी के लिए आते हैं। 

इस जबरदस्त प्रगति का श्रेय, इस स्व-सहायता समूह की अध्यक्ष विजया को जाता है, जिसने कुछ साल पहले एक घर में नौकरानी के रूप में काम करते हुए सजावटी मछलियों को देखा था और तब उसे एक विचार सूझा था। उसने कुछ मछलियां खरीदने के लिए पैसे जमा किए और घर पर ही उनको पालना शुरू कर दिया। वह बताती है, ''मुझे लगा कि मछलियां पालने का काम मेरे और मेरे समुदाय के लिए बड़ा ही सहज है।'' 

उन्हीं दिनों एक गैर-सरकारी संगठन 'तम्बरम कम्यूनिटी डेवलपमेंट सोसाइटी' ने इस इलाके का सामाजिक सर्वेक्षेण कराया और उसने देखा कि इरुलार समुदाय कर्ज में डूबा हुआ है। 'सोसाइटी' ने इरुलार महिलाओं को एक उद्यमिता प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल होने के लिए बुलाया। सोसाइटी के निदेशक धनराज बताते हैं, ''हमने उनसे बातचीत की और उनसे अपनी मदद के लिए एक स्व-सहायता समूह बनाने को कहा। शुरु-शुरु में तो वे हिचक रही थीं लेकिन धीरे-धीरे उनकी समझ में बात आने लगी।'' 

विद्या ने मछलीपालन का अपना प्रस्ताव रखा और 'सोसाइटी' इस बारे में उन्हें प्रशिक्षण देने पर सहमत हो गई। गर्व से धनराज बताते हैं, ''शुरु में वे लोग संगठित नहीं थीं। लेकिन उद्यमी होने की वजह से उनका काम ठीक से चल निकला। आज वे पूरी तरह से आत्मनिर्भर हैं।'' प्रशिक्षण पूरी करने के बाद उन्होंने 25 हजार रुपये से अपना काम शुरु कर दिया। यह पूंजी उन्हें कांचीपुरम सेन्ट्रल कोऑपरेटिव बैंक से मिली थी। 

भूपति मानता है, ''पहले तो हमें गैर-सरकारी संगठन पर भरोसा नहीं था और अपनी महिलाओं के 'सोसाइटी' केन्द्र में जाने के बारे में हमें चिंता हो रही थी।'' इसलि विजया के पति दवसामी और भूपति अजनबी के रूप् में इस केन्द्र में गए और उन्हें इस बात का भरोसा हो गया कि सोसाइटी के लोग धोखे से महिलाओं की खरीद-फारोख्त का धंधा नहीं कर रहे हैं। 

ठन दोनों से हरी झंडी मिलने पर विजया ने अपने समुदाय की अन्य महिलाओं को समूह बनाने के लिए राजी करने का काम शुरू कर दिया क्योंकि स्व-सहायता समूह के लिए कम से कम 12 सदस्यों की जरूरत थी। विजया कहती है, ''उस वक्त मुझे घर-घर जाकर महिलाओं को इस प्रयास में शामिल होने के लिए राजी करना पड़ा। अब हमारे समूह में जरूरत से भी अधिक सदस्य हैं।'' इस समय 13 महिलाएं इस समूह की सदस्य हैं तथा कुछ और महिलाएं इसमें शामिल होना चाहती हैं। 

अब तो इस समुदाय के पुरूष भी आसपास की झीलों में मछलियों को खिलाने के लिए कीड़े पकड़ते हैं। कारोबार अच्छा चल निकला है और हर सदस्य के हिस्से महीने में करीब 1,500 रुपये आ जाते हैं। 

अब ये महिलाएं अपना कारोबार फैलाने के लिए और जगह तथा बुनियादी सुविधाएं जुटाने का प्रयास कर रही है। विजया कहती है, ''कोयम्बतूर का यह ग्राहक दस हजार मछलियां खरीदना चाहता था, लेकिन हमें मजबूरन इस सौदे को नामंजूर करना पड़ा क्योंकि इतनी मछलियों के लिए हमारे पास जगह ही नहीं थी।'' 

भूपति कहता है, --यह काम शुरू करने से पहले, लोग हमारे साथ बैठकर चाय तक पीना पसंद नहीं करते थे लेकिन आज हमें समाज में एक सम्मानित दर्जा मिल गया है।'' लेकिन विडंबना यह है कि इरुलारों के इस प्रयास को आज की बदलती दुनिया के सामने लाने वाला कोई नहीं है और उन्हें समाज से मान्यता प्राप्त करने में दिक्कतें हो रही हैं। 

दिलचस्प बात यह है कि विजया और उसकी पीढ़ी को यह नहीं मालूम है कि उनकी आयु क्या है क्योंकि उनके समुदाय ने कभी जन्मों का रिकार्ड ही नहीं रखा है। लेकिन इन महिलाओं ने अपने बच्चों के लिए जन्म प्रमाणपत्र लेने और उन्हें स्कूल भेजने के बारे में अच्छी तरह से सीख लिया है। 

सच तो यह है कि विजया की बेटी इंदुलता ने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से स्नातक परीक्षा पास करके अपने समुदाय में एक हलचल मचा दी है। वह कहती है, ''मैं एक शिक्षक बनना चाहती हूं''। इंदुलता ने बीएड के लिए आवेदन दिया है। अभी इंदुलता करीब 35 बच्चों को पढ़ाती है, जो पुलिस अफसर और डॉक्टर बनना चाहते हैं। 

भूपति का कहना है, ''मेरे पिता को तो दो जून की रोटी से आगे सोचने की फुर्सत ही नहीं थी। लेकिन आज हम अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सपने देख रहे हैं।'' 

इस उद्यमशीलता ने समुदाय में स्त्री-पुरुष के अंतर को भी मिटा दिया है। यह बात भूपति की इस बेबाक टिप्पणी में झलकती है, ''बच्चों का भविष्य इन महिलाओं के हाथों में है।''

 

(साभार : वीमेन्स फीचर सर्विस)

हेमा विजय

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