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हथकरघा बुनकरों के बुरे दिन बीत गए 

अम्बुजम अनंतरामन  

मंगलागिरी (विमेन्स फीचर सर्विस) : आंधर प्रदेश में हथकरघा क्षेत्र में आई मंदी के मारे मंगलापुरी के बुनकर अपने हालात सुधारने के लिए कदम उठा रहे हैं। पोचमपल्ली और कलमकारी जैसे दूसरी विशिष्ट शैलियों की प्रेरणा से ये बुनकर अपनी साड़ियों में कसीदाकारी की सजावट और छापों का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे इस सुपरफाइन कपड़े से नए प्रकार के उत्पाद भी तैयार कर रहे हैं। 

एकदम सादा जमीन (बॉडी) और अलग रंग की ज़री (सुनहरी और रुपहली धागे से बनी) का बॉर्डर एक पारंपरिक मंगलागिरी साड़ी की विशेषता होती है। लेकिन कलमकारी शैली की खासियत हाथियों, तोतों और यहां तक कि नृत्यांगनाओं की आकृतियों के और पोचमपल्ली के मौलिक डिजाइनों के इस्तेमाल से मंगलागिरि के ये दक्ष कारीगर इस दम तोड़ती कला में नए प्राण फूंक रहे हैं (कलमकारी प्राकृतिक रंगों से सूती या रेशमी कपड़े पर बांस की कलम से चित्र बनाने की कला होती है जबकि पोचमपल्ली रेशमी साड़ियों में हाथ से कई रंगों के अलग तथा ज्यामितीय डिजाइन बुने जाते हैं)। 

दिलचस्प बात यह है कि ये नवीनताएं मात्र सजावट तक ही सीमित नहीं है। अब बुनकर अपने कपड़े से पर्दे, मेजपोश, पलंगपोश और ड्रेस मैटेरियल बना रहे हैं। इनका कपड़ा अपने अत्यंत रेशमी बुनावट वाले बारीक सूत और पक्के रंगों के लिए प्रसिध्द है। नइ नवीनताओं में पुरुषों के लिए रेडीमेड कमीजें और कुर्ते भी शामिल हैं। मात्र 200 रुपये की कमीज से व्यक्तित्व निखर आता है। 

40 वर्षीय कमला कंद्रू मंगलागिरि की गिनी-चुनी महिलाओं में से एक हैं जो मास्टर बुनकर के साथ-साथ एक उद्यमी भी बन गई हैं। वे कहती हैं, ''पहले, हथकरघा के कपड़े बुजुर्ग ही पहना करते थे। लेकिन अब यह बात नहीं है। नौजवान पीढ़ी में भी हथकरघा वस्त्रों का फैशन चल निकला है। नए-नए डिजाइनों और प्रिंटों ने इस रुझान को सिध्द कर दिया है।'' 

हथकरघा उद्योग में आई मंदी ने हजारों मास्टर बुनकरों को अपने करघे बंद करने और किसी दूसरे व्यवसाय में लगने के लिए मजबूर कर दिया था। कंद्रू का कहना है कि अब हालात कुछ बदले हैं। धीरे-धीरे बिक्री बढ़ रही है और यह करोड़ों रुपयों में जा पहुंची है। 

मंगलागिरी की आबादी करीब 80 हजार है जिसमें से करीब 50 प्रतिशत लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपनी आजीविका के लिए हथकरघा उद्योग में निर्भर हैं। 'माना मंगलागिरी' (हमारा मंगलागिरी) क लेखक और नगर विकास परिषद के एक सदस्य गोवर्धन राव कहते हैं कि इन बुनकरों में से 15 हजार से भी अधिक विजयवाड़ा जैसे पड़ोसी इलाकों में चले गए हैं और उन्होंने दूसरा व्यवसाय अपना लिया है। जो यहां रह भी गए थे, उन्होंने भी दूसरे करोबार शुरू कर दिए हैं। 

केवल 10 हजार बुनकरों ने अपना पारंपरिक व्यवसाय नहीं छोड़ा है। इनमें से करीब 100 मास्टर बुनकर हैं और बाकी कर्मचारी हैं या फिर मास्टर बुनकर के परिवार के सदस्य हैं, जो इस व्यवसाय के विभिन्न स्तरों पर काम कर रहे हैं। मास्टर बुनकर के पास करघे, शेड तथा दूसरे उपकरण होते हैं और वह कर्मचारियों को काम पर रखता है। मास्टर बुनकर उत्पादन के बाद कपड़े और तैयार माल की बिक्री करता है। मंगलागिरी की खासियत यह है कि यहां 25 प्रतिशत बुनकर महिलाएं हैं जो धागे से ताना बांधने और रीलिंग का काम करती हैं। 

मास्टर बुनकर के परिवारों में महिलाएं व्यापार प्रबंध करती हैं। पुरुष तैयार माल पहुंचाने और भुगतान वसूलने के लिए इधर-उधर जाते हैं जबकि महिलाएं कर्मचारियों को कच्चा माल देने, क्वालिटी पर नज़र रखने और मजदूरी के भुगतान का काम करती हैं। ऐसी व्यवस्था में बिचौलियों की जरूरत ही नहीं होती। 

प्रसिध्द नरसिम्हा मंदिर में आने वाले पर्यटक भी मंगलागिरी का काम खरीदते हैं। खरीददार थोक विक्रेता के निवास पर ही दुकान पर आते हैं और 500 रुपये और 1,500 रुपये के बीच एक या दो साड़िया खरीद कर चले जाते हैं। 

कच्चा माल (सफेद सूत) स्थानीय बाजार में मिलता है लेकिन यह हिंदूपुर, अनंतपुर, गुंटूर तथा अन्य स्थानों पर भी तैयार होता है। रंजक (डाई) गुजरात से मंगाई जाती हैं लेकिन रंगाई का काम स्थानीय इकाइयों में किया जाता है। इसके बाद सूत खड्डी में लगाया जाता है और मजबूती के लिए उस पर कलफ चढ़ाया जाता है। यह प्रक्रिया खासतौर पर हथकरघा बुनकरों द्वारा अपनाई जाती है, विद्युत करघों में इसका इस्तेमाल नहीं होता है।

कंद्रू के अनुसार, प्रति करघे बुने गए धागे की मात्रा, मंगलागिरी कपड़े की खासियत होती है। औसतन करघे पर एक साड़ी तैयार करने में एक सप्ताह से 10 दिन तक लग जाते हैं। राज्य के बुनकरों की समस्याओं की चर्चा करते हुए रवीन्द्रनाथ कहते हैं कि मिल के कपड़े से प्रतिस्पर्धा, कम मांग, अधिक उत्पादन लागत और सरकार की उपेक्षा से उनकी समस्याएं पैदा होती हैं। वैसे तो हथकरघा बुनकरों की मजदूरी अधिक नहीं है यह मात्र 50-60 रुपये प्रतिदिन जो पेचीदा डिलाइन होने पर 100 रुपये तक हो सकती है। लेकिन काम की मात्रा के लिहाज से वे विद्युत करघा बुनकरों से बेहतर स्थिति में हैं। वे बताते हैं कि विद्युत करघा बुनकरों में आत्महत्याओं के मामले प्रकाश में आए हैं। 

रवींद्रनाथ सामाजिक सुरक्षा और बुनकरों की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों पर अधिक यान देने पर जोर देते हैं। बुनकर परिवारों में कम उम्र में विवाह आम बात है। इसकी वजह से महिलाएं कम उम्र में ही गर्भवती हो जाती हैं। इससे महिलाओं की सेहत पर असर पड़ता है। करीब 90 प्रतिशत काम, महिलाएं ही करती हैं। 

एक अन्य मास्टर बुनकर, श्रीनिवास राजू कहता है कि मंगलागिरी के अधिकांश करघे गङ्ढे वाले (पिट) होते हैं। बरसात के दिनों में इनमें पानी भर जाता है जिसकी वजह से काम ठप्प हो जाता है। सूखी गर्मियां भी अच्छी किस्म का कपड़ा बनाने के लिए अच्छी नहीं होती है। गर्मी की वजह से कई बुनकर बीमार पड़ जाते हैं जिसकी वजह से काम ढीला पड़ जाता है और बुनकरों को कर्ज लेना पड़ जाता है। इससे वे कर्ज के जाल में फंस जाते हैं। 

डनकी समस्याओं के समाधान के लिए सरकार क्या कर रही है, यह पूछे जाने पर राजू बताते हैं कि सरकार ने हथकरघा बुनकरों की सहकारी संस्थाओं को कई फायदे दिए हैं। लेकिन इनमें से कई संस्थाएं ईमानदार नहीं हैं। उधर बुनकरों को वृध्दावस्था पेंशन दी जा रही है और उनके लिए सामूहिक बीमे और चिकित्सा कार्ड की व्यवस्था की गई है। 

नगरपालिका अध्यक्ष के अपने कार्यकाल के दौरान कंद्रू ने इस बात का ध्यान रखा था कि पेंशन बुनकरों तक पहुंचे। उन्होंने चिकित्सा शिविरों का भी आयोजन किया था और सड़के तथा नालियां बनाने पर भी जोर दिया था। अब मंगलागिरी में यह विश्वास पैदा हो चला है कि बुरे दिन बीत गए हैं और बुनकरों के हाथों में भविष्य सुरक्षित हैं। 

(साभार : विमेन्स फीचर सर्विस)

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