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लघुकथा

 

निमंत्रण  

बुढ़ापे ने जब गठिया के रूप में सेठ जवाहर बाबू के शरीर में दस्तक दी तो डॉक्टर की सलाह पर उन्होंने अपनी पक्की आढ़त की गद्दी पर बैठना लगभग बंद ही कर दिया। तीन बेटों में से बड़े दो पहले ही अपना नया काम-धंधा जमा चुके थे सो सबकी सहमति से छोटे को आढ़त सौंप दी गई। तीनों के काम अच्छे चल रहे थे और अपने-अपने क्षेत्र के नए दोस्त और उठने-बैठने वाले भी बनते जा रहे थे। संयुक्त परिवार था और तीनों भाइयों और उनकी बीवियों के बीच प्रेम और अनबन का अनुपात उतना था जितने से कि इस तरह का कोई परिवार चल सके। 

वक़्त गुज़रासहालग के दिन आए। शादियों के इस बार के मौसम का जब पहला निमंत्रण-पत्र घर में आया तो बाबू जी के हाथ लगा। लिफ़ाफ़े पर मोटे अक्षरों में सपरिवार तो लिखा था लेकिन उनके नाम के स्थान पर छोटे बेटे का नाम चस्पा किया गया था, उन्हें लगा कि शायद लिखने वाले से भूल हो गई हो। पर उस दिन के बाद से तो ऐसा सिलसिला ही चल निकला। कोई कार्ड मझले बेटे के नाम से सपरिवार लिखकर आता तो कोई छोटे के से, तो कोई-कोई ऐसा भी आता कि जिसमे तीनों बेटों के नाम के साथ सपरिवार निमंत्रण होता। सेठ जी के लिए यह बात अनुभवों की गिनती में इज़ाफ़ा भर नहीं थी बल्कि उन्हें इससे गहरा धक्का लगा लेकिन ये दुःख कहते भी तो किससे और क्या कहते? उनके अपनों की तो इसमें कोई गलती थी नहीं। जब-जब कोई कार्ड आतासेठ जी सोचते कि 'घुटनों के इस दर्द को लेकर शादी-ब्याहों में जाना भी किसे है?' तो कभी 'ठीक ही तो है, ये ब्याह-बारातें कौन से हम जैसे उम्रदराजों के लिए बने हैं' और कभी 'मेरे जाने के बाद जो बदलाव आना था वो थोड़ा पहले आ गया क्या फर्क पड़ता है' सोचकर खुद को ही समझा लेते। लेकिन बात आमंत्रणों में जाने की होती तो ये समझाइशें काम भी करतीं। 

एक दिन दोपहर को छोटी बहू दरवाजे के सामने की गैलरी वैक्यूम क्लीनर से साफ़ कर रही थी कि किसी ने दरवाज़े पर कॉलबेल बजाई। बहू ने मशीन बंद कर दरवाज़ा खोला, शायद फिर कोई कार्ड बाँटने आया था।

- भाभी जी, घर में जो शादी है उसका निमंत्रण-पत्र है 

कुछ देर खामोशी रही फिर थोड़ा तल्ख़ लहज़े में बहू की आवाज़ सुनाई पड़ी  

- माफ़ कीजिये भाईसा', ईश्वर की दया से हमारा परिवार अभी तक बँटा नहीं है और घर के मुखिया बाबू जी ही हैं। आप तीनों भाइयों के नाम के साथ सपरिवार लिखने के बजाय बाबू जी के नाम पर सपरिवार लिख सकें तभी हम आमंत्रण स्वीकार कर सकेंगे।  

 

सेठ जी को लगा जैसे कि बहू ने अचानक घरघराती उस मशीन से उनके अंदर-बाहर का सारा दर्द खींच लिया हो। 


 

दीपक मशाल
 

 जनवरी 2015


 


 

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