मुखपृष्ठ कहानी कविता | कार्टून कार्यशाला कैशोर्य चित्र-लेख |  दृष्टिकोण नृत्य निबन्ध देस-परदेस परिवार | फीचर | बच्चों की दुनिया भक्ति-काल धर्म रसोई लेखक व्यक्तित्व व्यंग्य विविधा |   संस्मरण | साक्षात्कार | सृजन स्वास्थ्य | साहित्य कोष |

 

 Home | Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | FeedbackContact | Share this Page!

 Click & Connect : Prepaid International Calling Cards 

 
चैनल्स  

मुख पृष्ठ
कहानी
कविता
कार्यशाला
कैशोर्य
चित्र-लेख
दृष्टिकोण
नृत्य
निबन्ध
देस-परदेस
परिवार
फीचर
बच्चों की दुनिया
भक्ति-काल धर्म
रसोई
लेखक
व्यक्तित्व
व्यंग्य
विविध
संस्मरण
साक्षात्कार
सृजन
स्वास्
थ्य
साहित्य कोष
 

   

 

 

दीपावली 2001

यह पूरा वर्ष घटनाप्रधान वर्ष रहा है। चौंका देने वाली घटनाओं की शुरुआत गणतन्त्र दिवस के दिन गुजरात में आए भीषण भूकम्प से ही हो गयी थी‚ और 11 सितम्बर को तो पूरा विश्व हतप्रभ हो गया था। उसके बाद आतंक के खिलाफ अमेरिका की जंग चल ही रही है अफगानिस्तान में जिसके निकट भविष्य में समाप्त होने की कोई संभावना नज़र नहीं आती।
ऐसे में दीपावली‚ रमज़ान और क्रिसमस के लिये उत्साह कैसे शेष रह सकता है? पूरे विश्व का व्यापार मंदा पड़ा हो‚ अनिश्चितताएं घेरे हों तो त्यौहारों से कई दिन पहले शुरु हो जाने वाली रौनकों पर इसका असर पड़ता ही है। फिर भी कहते हैं ना दुनिया नहीं रुकती‚ मेले हर साल उठ के फिर जम जाते हैं।
इस बार सबके मन आहत हैं पर त्यौहार तो मनेंगे‚ सारी रस्में निभेंगी। दीप भी जलेंगे‚ क्रिसमस ट्री भी सजेंगे‚ ईद पर भी मेले लगेंगे पर कहीं कुछ छूट गया सा लगेगा। बहुत तीव्रता से अभाव महसूस होगा उनका जिन्हें हमने खोया भूकम्प में‚ कश्मीर के धमाकों में‚ न्यूयार्क की ध्वस्त ट्विन टॉवर्स के मलबों में‚ और अब खो रहे हैं जिन्हें अफगानिस्तान में एक जूनूनी ओसामा बिन लादेन की ज़िन्दा या मुर्दा देह के लिये।
रोशनी से भरे मकानों के बीच बीच कितनी अटपटी लगेंगी वो सूनी दहलीज़े जिनके चिराग वक्त से पहले गुल हो गये हैं। क्या उन सूने द्वारों के प्रति हमारा फर्ज नहीं? क्या एक भी उजाले की किरण उनके हिस्से नहीं?
क्या मानवता का इतना हृास हो चुका है कि सम्वेदन हीन हो हम सारे उजाले अपने लिये रख लेंगे? माना दीपावली इस बार कितने ही अंधेरों से निकल कर आई हो पर जितने भी बचे उजाले हैं उमंगे हैं आओ हम बांटे उनके साथ जिनके हिस्से के उजाले कहीं खो गये हैं। अंधेरों को काटने के लिये उजाले तो बांटने होंगे ना।
इस बार दीपावली बच्चों के लिये खास है क्योंकि वह उनके लिये दोहरी खुशी लेकर आएगी‚ इस बार दीपावली 14 नवम्बर याने बालदिवस का हाथ पकड़ कर आई है। याद रहे इस बार कोई बच्चा उदास न हो। उदास बच्चे के मुख पर हंसी की एक किरण हज़ारों दीपकों से कहीं अधिक रोशन होगी।

– राजेन्द्र कृष्ण
 

दीपावली
अपनों के साथ मनाने में ही दीपावली की सार्थकता है - अनुपमा
अब के ऐसी दिवाली आये - आस्था
अलि प्रिय अब तक न आए - सुधा रानी
ओ चंचला लक्ष्मी - सुधा रानी
इस बार दीपावली कुछ अलग तरह मनाएं - मनीषा कुलश्रेष्ठ
एक दीपावली पापा के बिना - अंशु
एक नन्हीं बच्ची की दीपावली - अवनि कुलश्रेष्ठ
कर भला होगा भला - सुषमा मुनीन्द्र
गायें गीत बालदिवस के - कनुप्रिया कुलश्रेष्ठ
तुम्हारी बातें दीपक कतार सी - नीलम जैन
दिवाली का दिन - सुमन कुमार घेई
दिवाली का पर्व - राजेन्द्र कृष्ण
दिवाली दिवाली - संगीता गोयल
दिवाली स्तुति - सुमन कुमार घेई
दीपावली - राज जैन
दीपावली 2001 - राजेन्द्र कृष्ण
दीपावली और बालदिवस - अंशुल सिन्हा
पंचमहोत्सव का मुख्य पर्व - दीपावली - अचरज
यही तो है दीपावली - आयूषी श्रीवास्तव
लक्ष्मी पूजा - सुधा रानी
सुबह का भूला - मनीषा कुलश्रेष्ठ

Top  

Hindinest is a website for creative minds, who prefer to express their views to Hindi speaking masses of India.

             

 

मुखपृष्ठ  |  कहानी कविता | कार्टून कार्यशाला कैशोर्य चित्र-लेख |  दृष्टिकोण नृत्य निबन्ध देस-परदेस परिवार | बच्चों की दुनिया भक्ति-काल धर्म रसोई लेखक व्यक्तित्व व्यंग्य विविधा |  संस्मरण | साक्षात्कार | सृजन साहित्य कोष |
प्रतिक्रिया पढ़ें! |                         प्रतिक्रिया लिखें!

HomeBoloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | FeedbackContact

(c) HindiNest.com 1999-2016 All Rights Reserved. A Boloji.com Website
Privacy Policy | Disclaimer
Contact : manishakuls@gmail.com