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कालजयी प्रेम-पत्र

कीट्स का पत्र फेनी के नाम


मई , 1820 मंगलवार प्रात :

मेरी प्रियतमा प्रेयसी,
मैंने तुम्हारे लिए एक पत्र लिखा था। मुझे आशा थी कि तुम्हारी माँ से मिलना होगा। अब अगर यह पत्र मैं तुम्हारे पास भेजूँ तो यह मेरा स्वार्थ होगा, क्योंकि मैं जानता हूँ कि तुम्हें यह थोड़ा कष्ट पहुँचाएगा। मैं चाहता हूँ तुम समझो कि तुम्हारे प्रेम ने मुझे कितना दुःख और पीड़ित बना दिया है। मैं तुम्हें अपनी ओर खींचने की जितनी भी कोशिश कर सकता हूँ, करता हूँ, और चाहता हूँ कि तुम मुझे अपने हृदय का पूरा प्यार दो। इसी एक बात पर मेरी जिंदगी निर्भर करती है। तुम जरा इधर-उधर हिलीं या तुमने अपना ध्यान इधर-उधर किया और मेरा हृदय फट-सा गया। मुझे तुम्हारा गहरा लालच हो गया है.... मेरे सिवाय किसी भी दूसरी चीज के बारे में मत सोचो... ऐसे मत रहो जैसे मैं इस दुनिया में हूँ ही नहीं। मुझे भूल मत जाओ, लेकिन यह कहने का मुझे क्या अधिकार है कि तुम मुझे भूल गई हो?
शायद तुम सारे-सारे दिन मुझे याद करती हो। क्या अधिकार है मुझे यह कहने का, कि मेरे कारण तुम अपनी खुशियों को छोड़ दो?
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फ़्रांज काफ्का का पत्र फिलिस के नाम

19 नवम्बर 1912

प्रिय फिलिस,


मैं आज जो तुमसे मांग रहा हूँ ,वह तुम्हें मेरा पागलपन लग सकता है और मुझे तो बिलकुल ऐसा ही लगना चाहिए क्योंकि वो मैं ही तो हूँ जिसे तुम्हारे वो पत्र मिलते हैं । मुझे पता है कि यह तुम्हारे जैसे प्यार में डूबे हुए को एक बेहद कठिन इम्तिहान में डालना होगा|

तो फिर सुनो ,मुझे तुम हफ्ते में एक बार ही पत्र लिखा करो ताकि वह रविवार को मुझे मिले, क्योंकि रोजाना मुझमे इतनी हिम्मत नहीं कि तुम्हारे पत्रों से गुजर सकूँ । मैं सहन नहीं कर पाता उन्हे ! जानना चाहती हो तो सुनो ,जब मैं तुम्हारे किसी पत्र का जबाव देता हूँ ,एक बनावटी चुप्पी के साथ बिस्तर पर औंधे लेट जाता हूँ लेकिन मेरा दिल मेरे पूरे शरीर के साथ बहुत तेज़ी से धडक रहा होता है और मुझे तुम्हारे सिवा कुछ याद नहीं रहता । मुझे इसके सिवा कुछ याद नहीं रहता कि मैं तुम्हारा हूँ और इस भावना को व्यक्त करने के लिए इन शब्दों के अलावा मेरे पास कोई और तरीका नहीं , और ये शब्द इतने प्रभावी नहीं । यही कारण है की मैं ये नहीं जानना चाहता कि तुम क्या सोच रही हो । - आगे पढें


 


जनवरी 2021 अंक

कफ़स के पंछी का गीत
(माइया एंजलू की अत्मकथा के अंश)

मैं ने तय कर लिया था कि सेंट लुईस मेरा अपना देश नहीं है। मैं टॉयलेट में तेज़ गति में फ्लश चलने की आवाज़ या डब्बाबन्द खानों की और दरवाज़ों की घंटियों, कारों, रेलों – बसों के शोर की आदी नहीं हो सकी थी,जो कि दीवारों को फोड़ता हुआ या दरवाज़ों से रेंगता हुआ अन्दर आता था। मेरे दिमाग के हिसाब से, मैं केवल कुछ ही सप्ताह सेंट लुईस में रही होऊंगी। जैसे ही मुझे अहसास हो गया कि मैं अपने घर पर नहीं… या ये सब मेरे नहीं है… मैं कायरों की तरह रॉबिन हुड के जंगलों और ऐली ओप की वादियों में जा उतरती थी, जहां वास्तविकता अवास्तविकता में बदल जाती थी और यहां तक कि वह हर दिन बदलती रहती थी। मैं यह सुरक्षा कवच हमेशा साथ रखती थी, बल्कि इसे स्टांप की तरह इस्तेमाल करती थी कि - मैं यहां रहने नहीं आई हूँ।- आगे पढें

अनुवाद - मनीषा कुलश्रेष्ठ

नए साल पर

कई साल गुज़रे - मोहसिन नक़वी

नया साल - परवीन शाकिर

नए साल की शुभकामनाएँ! - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

कविताएं  -  नीरज मिश्रा

गंगा -  संजय तिवारी

उपन्यास अंश

जन्म-जन्मांतर - विवेक मिश्र
 

कहानियां : उस पार से

एक पाठक - मक्सिम गोर्की (रूस से)
अनुवाद - अनिल जनविजय

रेत की किताब - जॉर्ज लुईस बोर्खेज़ (अर्जेंटीना से)
अनुवाद - मनीषा कुलश्रेष्ठ

गीदड़ और अरब -  फ़्रैंज़ काफ़्का ( जर्मनी से)
अनुवाद : सुशांत सुप्रिय

दुर्घटना -  म्यूरोंग क्स्यूकन (चीन से)
अनुवाद : सुशांत सुप्रिय
 

आत्मकथा अंश

टूटे पंखों से परवाज तक - सुमित्रा महरौल
 



  

डायरी

बम्बई ... ? - मोहन राकेश

निबंध

कालिदास की कविता है तो लोगों के लिये
-मुरलीधर चाँदनीवाला  

संवेदना का एक अनुष्टुप - मुरलीधर चाँदनीवाला


एक पहाड़ और गुस्ताख किरदार (
हिंदी उपन्यासों में स्त्री चेतना) -  उमा

 

ललित निबंध

असार संसार में सुगंध सार - डॉ . राजरानी शर्मा
 

एक अद्भुत अपूर्व स्वप्न - भारतेंदु हरिश्चंद्र

नाक - बालकृष्ण भट्ट

समय - बद्रीनारायण प्रेमघन

मेरे राम का मुकुट भीग रहा है -विद्या निवास मिश्र
कुब्जा सुंदरी - कुबेर नाथ राय

कछुआ धर्म - चंद्रधर शर्मा गुलेरी

कुटज - हजारी प्रसाद द्विवेदी

मजदूरी और प्रेम -सरदार पूर्ण सिंह

आलस्य भक्त - बाबू गुलाब राय

प्यारे हरिचंद की कहानी रह जाएगी - विद्या निवास मिश्र

साहित्य देवता - माखनलाल चतुर्वेदी

गेहूँ बनाम गुलाब - रामवृक्ष बेनीपुरी

अंतरिक्ष-युग की ‘माता मइया’ -
विवेकी राय

ईश्वर रे, मेरे बेचारे...! -फणीश्वरनाथ रेणु

मरुथल की सीपियाँ - अज्ञेय

ठेले पर हिमालय - धर्मवीर भारती

सूना  - भगवत शरण उपाध्याय


मौन - रघुवीर सहाय

आड़ू का पेड़ - रमेश चंद्र शाह

 


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