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नई कविताएँ

अभियोगिनी गंगा -
डॉ. अनिल कुमार दीक्षित

विलुप्त होने तक - डॉ अनिल कुमार दीक्षित


साक्षात्कार : प्रेरणा श्रीमाली से कथक और वर्तमान परिदृश्य, कथक व कविता पर लिया गया
मैं नर्तकी हूँ. नृत्य मेरी भाषा है. जीवन के इस बिन्दु और आयु में मैं सहज ही कह सकती हूँ कि नृत्य मेरे जीवन को निर्देशित करता है.- आगे पढ़ें


मेरी डायरी - अनिरुद्ध उमट
‘वास्तव में कवि को अज्ञात रहना चाहिए। जिस क्षण जो शब्द लिखा, वही उसकी ध्वनि, मौन, नाद, उजाड़ था, उच्चारण था । बस। उसका दोहराव फिर कवि से भी संभव नहीं। फिर अगर कवि करता भी है तो वह कुछ और क्रिया होती है, असफल खोज, असफल दस्तक, अनसुनी पुकार, गूंगी.....कविता नितांत निजी कर्म है मित्र! अन्त्येष्टि की तरह। वह सार्वजनिक प्रदर्शन में अपनी काया...माया में बेगानी हो जाती है। उसका उलाहना हमारी आत्मा सुनती है। उसकी कलप हमारे भीतर टीस मारती है।’ - आगे पढ़ें


डायरी लेखन - एक तरल विधा   - अरुण प्रकाश

डायरी का एक पन्ना,  मुठभेड़ में मारे गये एक कुख्यात अपराधी के नाम - कंचन चौहान

एक फौजी की डायरी-1 - गौतम राजरिशी
एक फौजी की डायरी-2
एक फौजी की डायरी-3
एक फौजी की डायरी-4
एक फौजी की डायरी-5

 

डायरी का आखिरी पन्ना- विवेक मिश्र
आज अम्मा की अलमारी में प्राची का पत्र मिला। डेढ़ साल पुराना पत्र।…और इन दिनों, मैं यही समझता रहा कि औरंगाबाद से लौटने के बाद सब खत्म हो गया, कुछ नहीं बचा हमारे बीच। - आगे पढ़ें  

 

निबंध

अमूर्त में मूर्त ऐन्द्रिकता का संगीत : अशोक वाजपेयी की कविताएँ
अशोक जी की प्रेमकविताओं के अन्दर प्रतीक्षा के पलों में उभरे रहस्यमय बिम्ब करवट लेते हैं, सपनों, दिवास्वप्नों, भ्रमों, कोलाजों, प्रकाशपुँजों, धुंधलकों के माध्यम से इनमें इतनी अर्थबहुलता आ जाती है कि इन गलियारों में घूमता पाठक चमत्कृत होता ही होता है. वे जानते हैं कि कौनसा संस्कृतनिष्ठ शब्द किस तरह से रखा जाए कि, आधुनिक कविता के गलियारे में वह किसी एंटीक सा खूबसूरत ‘इफेक्ट’ पैदा करे. उनकी प्रेम कविता की अमूर्तता में मूर्त संसार के कई वलय हैं, जो परस्पर समानांतर, सहजीवन जीते हैं - आगे पढ़ें

कहानियाँ

आत्मजा - रोहिणी अग्रवाल
कहानी कुछ साफ नहीं है दिमाग में। लगता है नैन-नक्श भी पूरे नहीं लिए उसने। लेकिन मिसेज अलका नंदा पता नहीं कैसे पूरी कद-काठी लेकर बाहर आने को बेचैन हैं। मैं बार-बार बरज रही हूँ - नहीं, प्रीमेच्योर डिलीवरी में रिस्क रहता है। मां और बच्चा दोनों के लिए। लेकिन मिसेज अलका नंदा शायद कुछ ज्यादा ही जिद्दी स्वभाव की हैं।
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लिखते हुए कुछ ख़्वाब से - अनघ शर्मा 
लक-दक करके दामन से झाड़ो तो अनगिनत यादें झड जाती हैं। पर ये भी तो सच ही है कि इतनी आसानी से कभी कोई याद भी नहीं आता। दिली तौर पर याद करना और ज़हनी तौर पर याद करना दोनों अलग-अलग हैं, फिर भी कुछ यादें ज़हन और दिल के बीच कहीं अटकी रहती हैं। उसकी याद भी कुछ ऐसी ही थी, कहीं ज़हन और दिल के बीच सुस्त पड़ी।  - आगे पढ़ें




 

Manisha Kulshreshtha

 

विरासत से विशेष

ताई ''ताऊजी, हमें लेलगाड़ी (रेलगाड़ी) ला दोगे?" कहता हुआ एक पंचवर्षीय बालक बाबू रामजीदास की ओर दौड़ा।
बाबू साहब ने दोंनो बाँहें फैलाकर कहा- ''हाँ बेटा,ला देंगे।'' उनके इतना कहते-कहते बालक उनके निकट आ गया। उन्होंने बालक को गोद में उठा लिया और उसका मुख चूमकर बोले- ''क्याक करेगा रेलगाड़ी?''
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पढ़ते हुए : मेरे कुछ नोट्स -शैलेन्द्र सिंह्
पोर्चिया इन्ही subtle सत्यों को पकड़ते हैं, उनके ‘one लाइनर्स’ जिन्हें विश्लेषित करने पर कई पन्ने रंगे जा सकते हैं , पोर्चिया एक मोमेंट में देख ली गयी ‘अनंतता’को एक स्टिल फोटोग्राफ की तरह पकड़ते हैं, न होने की शून्यता नहीं अपितु होने की शून्यता,एक इंटरव्यू में वे कहते हैं कि ऐसा कोई केंद्र नहीं है जहाँ जिंदगी को लोकेट किया जा सके.   - आगे पढ़ें

नहान - अरुण प्रकाश
मैं जब उस मकान में नया पड़ोसी बना तो मकान मालिक ने हिदायत दी थी - ''बस तुम नहान से बच कर रहना। उसके मुँह नहीं लगना। कुछ भी बोले तो ज़ुबान मत खोलना। नहान ज़ुबान की तेज़ है।  -
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निबन्
- अरुण प्रकाश

हम इक उम्र से वाकिफ़ है
 

इस बहाने
भारत में राष्ट्रीय अखण्डता : भाषायी समन्वय - डॉ. दिविक रमेश
सीमाओं के आर-पार करोड़ों के दिलों में बसते हैं भगत सिंह

 

साक्षात्कार
रोमानिया में हिन्दी - संजय कुमार
 

साहित्य कोष
इस्मत आपा की कहानियाँ और भारतीय मुस्लिम समाज

चर्चित ब्लाग
पढ़ते - पढ़ते - मनोज पटेल
आपका साथ साथ फूलों का - अपर्णा मनोज
प्रतिभा की दुनिया -
प्रतिभा कटियार
Antheia - कनुप्रिया


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