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धारावाहिक उपन्यास

आगे खुलता रास्ता

 
मूल और रूपान्तरण : नंद भारद्वाज

केन्द्रीय साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत राजस्थानी उपन्यास


 

भाग: तीन

 

6.

 

  रामनारायण की नौकरी एक बंधी लीक में चलती रही, लेकिन इस बीच घर-परिवार में कई तरह के उतार-चढ़ाव आये। तीन भाइयों की गृहस्थी बस जाने के बाद पहला सवाल तो घर और संपत्ति के बंटवारे का ही सामने आ खड़ा हुआ। चार भाइयों में से तीन हनुमानगढ़ में थे, सो पहली जरूरत तो सभी के अलग-अलग घर होने की ही आई। छह सौ वर्गगज के प्लॉट को दो हिस्सों में बांटकर लछमन और नेमा ने अपनी जरूरत के हिसाब से दो घर पहले ही बना लिये थे, जो होश संभालने के बाद शुरू से यहीं रहते आ रहे थे। उनके मानस में यह बात साफ थी कि हनुमानगढ़ की यह जमीन उन दो भाइयों के नाम रहेगी और पीलीबंगा का पुश्‍तैनी घर रामू और हरि के हिस्से में। रामनारायण की पत्नी गीता शादी के बाद से ज्यादातर इस पुश्‍तैनी घर में ही रही, जबकि नेमाराम की पत्नी गौने के बाद सीधी हनुमानगढ़ ही पहुंच गई। गीता कभी हफ्ते-दस दिन के लिए जेठानियों के पास आई भी तो उसे यह कभी महसूस नहीं हुआ कि उस घर में उसके पति का कोई हिस्सा है, जबकि रामनारायण यह इच्छा जरूर रखता था कि या तो भाई उसी प्लॉट में उसका हिस्सा रखें या पास ही कोई और प्लॉट खरीदने में उसकी मदद करें। घर का धंधा जमाने में भी वह अपनी कोशिश में हमेशा उनकी मदद करता रहा, इसलिए उसके हिसाब से तो घरेलू धंधे में भी उसका हिस्सा माना जाना चाहिए। बड़े भाई लछमन का यह सोच था कि पीलीबंगा में जो खेती की जमीन है, वह चारों भाइयों में बराबर बंट जाए तो वे अपना हिस्सा लेकर उससे मिलने वाली राशि को किसी दूसरे काम में लगाएं। छोटा भाई हरि बड़े भाइयों की इस राय से सहमत नहीं था। हरि का कहना था कि अगर सभी भाई खेती करने में दिलचस्पी रखते हों तो वे भले ही अपने-अपने हिस्से में अलग खेती करवा लें, लेकिन पुश्तैनी संपत्ति को इस तरह बेचकर गंवाना उचित नहीं है। रामनारायण की अपनी अलग दुविधा थी। वह पीलीबंगा वाले पुश्‍तैनी घर और जमीन में अपना हिस्सा तो चाहता ही था, अपनी नौकरी के चलते हनुमानगढ़ में भी अपना अलग घर बनाने की इच्छा रखता था। रामनारायण को उसी प्लॉट में अलग हिस्सा देने या नया प्लॉट खरीदने के लिए मदद करने में बड़े भाइयों की न कोई दिलचस्पी थी और न इतनी गुंजाइश। मां और छोटा भाई हरि खुद उसी की कमाई से घर चलाने की उम्मीद लिये बैठे थे। हरि के सामने अपनी खेती के काम को आगे बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। बरसात के दिनों में नाली वाले इलाके में पानी की मात्रा बढ़ जाने से अनाज की उपज वैसे भी ठीक हो जाती थी, इसलिए हरि को उसी में अपना अच्छा भविष्य दीख रहा था। 

    गीता एक धीमे स्वभाव वाली औरत थी। उसे न अपने जेठ-जेठानियों से ज्यादा अपेक्षाएं थीं और न कोई शिकायत। पीलीबंगा वाले घर में उसे कोई कठिनाई नहीं थी। अपने ब्याह के बाद के इन दो सालों में वह अपनी सास और घर-परिवार के सभी लोगों से पूरी तरह घुल-मिल गई थी। देवर हरि तो जैसे उसकी हाजरी में ही खड़ा रहता। वह हरि को इस बात के लिए समझाने का प्रयत्न भी करती कि वह अपनी पढ़ाई आगे जारी रखे, लेकिन हरि अपने भाइयों का रवैया जान गया था। इसलिए वह अब घर की जिम्मेदारियों को लेकर किसी और पर निर्भर नहीं रहना चाहता था। शादी के तीसरे साल उसकी भाभी गर्भवती हुई और सातवें महीने जब उसका भाई उसे पहले जापे के लिए अपने साथ महाजन ले गया, तो एकाएक घर की सारी जिम्मेदारी उसी पर आ पड़ी। बूढ़ी मां दो वक्त की रोटी तो बना देती, लेकिन घर-खर्चे की चिन्ता तो उसी को करनी होती। भाभी के महाजन चले जाने के बाद रामनारायण भी दो महीनों में सिर्फ एक दिन के लिए घर आया और वह भी खाली हाथ। न उसने मांग की और न रामनारायण ने ही पूछा कि घर का खर्च कैसे चल रहा है। इस एक बात से ही हरि को सूझ पड़ गई कि अब घर का खर्चा चलाने के लिए भाई पर निर्भर रहना अकारथ है। उसने दसवीं की परीक्षा देने के बाद आगे पढ़ने का इरादा अन्तिम रूप से छोड़ दिया।

    दो महीने बाद भाभी के पीहर से खबर आई कि वह एक भतीजी का चाचा बन गया है। वह बेहद खुश हुआ और अपने मोहल्ले के सभी घरों में खुद गुड़ बांटकर आया। यों उसी सप्ताह उसका परीक्षा परिणाम भी आया था और चाचा बनने के साथ दसवीं पास कर लेने की खुशखबरी भी इसमें शामिल थी, लेकिन इस उपलब्धि को लेकर उसके मन में कोई खास उत्साह नहीं था।

    बेटी पैदा होने के कोई ढाई महीने बाद गीता अपने पति के साथ वापस घर लौट आयी। घर में पहुंचते ही हरि ने अपनी भाभी की गोद से फूल-सी कोमल भतीजी को तुरंत अपने कब्जे में ले लिया। बच्ची को अपनी गोद में लेकर प्यार से उसकी ओर देखते हुए वह चहक उठा, ‘‘हुम्... बहुत प्यारी बच्ची है, क्या नाम रखा है इसका, भाभी!’’ उसकी पहली जिज्ञासा यही हुई।

    ‘‘आप ही रख दो कोई छोटा-सा नाम। पंडितजी ने तो भारी-सा नाम रखवा दिया है, सत्यवती! वैसे कहते तो सब इसे सत्तो ही हैं। पर और भी कई नाम पंडितजी ने सुझाए थे, लेकिन आपकी बड़ी दीदी को यही नाम पसंद आया।’’ गीता ने संकोच करते हुए धीरे-से नामकरण का ब्यौरा उसके सामने रख दिया।

    हरि ने भतीजी को दुलारते हुए, जैसे अपने ही मन की बात दर्शा दी। वह बोला, ‘‘कहो बाई सत्यवती! इस कलियुग में ऐसे कठिन नाम के साथ कैसे निभाव होगा?’’

    गीता और रामनारायण की अनायास एक-दूसरे से नजरें मिली और मानो किसी अदृश्य में स्थिर हो गई।

    पत्नी और बच्ची को सुरक्षित घर पहुंचाकर अगले ही दिन रामबाबू अपने काम पर वापस लौट आये। उनकी नौकरी का यह चौथा साल था। इन चार सालों में वे कंपनी के नियम-कायदों से तो भली-भांति परिचित हो गये, लेकिन किसका काम मन लगाकर समय पर निपटा देना है और किसका आंटे में डालकर अटका देना है, यह खेल अभी उनकी पकड़ से बाहर था। दफ्तर का माहौल भी इस बीच कुछ बदल-सा गया था।

    असल में पिछले साल कोई सात-आठ महीने पहले हैड बाबू अमरजीतसिंह के प्रमोशन और उनके तबादले के बाद जो नये हैड-बाबू आये - बाबू केवलचंद, उनके तो सारे रंग-ढंग ही अलग थे। जहां सरदार अमरजीतसिंह के संकोच से दफ्तर का नीचे का स्टाफ ही क्या स्वयं मैनेजर भी नियम-कायदे से काम करना पसंद करते थे, वहीं बाबू केवलचंद ने अपना काम संभालते ही सारे नियम-कायदे और संकोच दूर रखवा दिये। दफ्तर के बाबुओं को जल्दी ही यह बात समझ में आ गई कि नये हैड-बाबू को नियम-कायदों और ईमानदारी से काम करने वालों में कोई खास दिलचस्पी नहीं है। जो बाबू उनके बिना कुछ बताये-समझाये उनका रुझान देखकर ठेकेदारों के बिल-दावे निपटाता और स्टोर में सामान की खरीद के कागज तैयार कर देता, वही उनकी नजर में एक कामयाब बाबू था।

    रामबाबू ने तो जैसे नियम-कायदे और ईमानदारी से काम करने की कसम खा रखी थी, जबकि दूसरे बाबुओं ने पहले ही सप्ताह में केवलबाबू से अपना तालमेल बिठा लिया था। केवल रामनारायण ही थे, जो इस मामले में सबसे सुस्त और पिछड़े रह गये। हैड-बाबू को कुछ घरेलू सामान की जरूरत थी और रामबाबू उनकी इच्छा को समझे बगैर नियम-कायदों को लेकर बैठ गये। नतीजा यह हुआ कि अगले सप्ताह से ही ऑफिस स्टोर का सारा काम उनसे लेकर गौतमबाबू को दे दिया गया। मैनेजर और हैड-बाबू को राजी रखने के बाद स्टोर में सामान की खरीद और उसके वितरण में अमूमन स्टोर-बाबू का हाथ खुला हो जाता। स्टाफ वैलफेयर की ऐसी कितनी ही चीजें थीं, जो सिर्फ कागजों में खरीदी जाने लगी और कागजों में ही बांट दी जाने लगी।

    थोड़े दिनों बाद जिप्सम के ठेकेदारों के बिल और दावे निपटाने का काम अनसोचे ही रामबाबू के जिम्मे आ गया। असल में उनका सहयोगी पाबूदान दो दिन पहले ही एक ठेकेदार से विवाद में उलझ गया था। शाम को अपने घर में या दोस्तों के बीच पाव-अद्धा शराब की घूंट लेने की आदत तो उसकी शुरू से थी ही, पिछले कुछ दिनों से वह दफ्तर में ही पीकर आने लगा था। सरदार अमरजीत के रहते किसी कर्मचारी की दफ्तर में शराब पीकर आने की हिम्मत कभी नहीं हुई। ऐसे मामलों में सरदार बहुत सख्त मिजाज के आदमी थे और उसूल के पक्के। नये हैड-बाबू के अपने अलग रंग-ढंग के चलते वह आशंका और लिहाज तो उनके आते ही मिट गया। पव्वा गले उतरने के बाद तो पाबूदान अपने को राजा भोज ही समझने लगता। वह किस ठेकेदार की धौंस सुने। उसने लोगों के सामने ही ठेकेदार को अपनी ठकुराई बतानी शुरू कर दी। ठेकेदार ने हैड-बाबू से जब इसकी शिकायत की और उसकी समस्या का निवारण न होने पर हैड-ऑफिस तक जाने की चेतावनी दी, तो विवाद को ठंडा करने के लिए हैड-बाबू को यही ठीक लगा कि फिलहाल ठेकेदारों के बिल निपटाने का काम रामबाबू को सौंप दिया जाए। केवलबाबू इस एक तीर से दो शिकार करना चाह रहे थे। उनका सोचना था कि या तो रामबाबू खुद ही ठेकेदारों की संगति में नये गुर सीख जाएंगे और अगर व्यर्थ की ईमानदारी की हेकड़ी में रहेंगे, तो कभी किसी आंटे में लेकर उनके वे माली-पन्ने भी उतरवा लिये जाएंगे। ठेकेदारों ने अपने दावे निपटाने की एवज में जब रामबाबू के आगे कुछ सेवा-चाकरी की पेशकष की, तो उन्होंने हाथ जोड़ दिये। लेकिन ठेकेदारों ने यह बात उन्हें जरूर समझा दी कि वे कोई सेवा लें या न लें, केवलबाबू और मैनेजर तो इसी आधार पर उनका काम करते हैं।

    रामबाबू अजीब दुविधा में पड़ गये। आखिरकार उन्हें यही बात ठीक लगी कि वे अपना काम नियम-कायदे से करते रहेंगे। हैड-बाबू और मैनेजर का ईमान-धर्म वे जानें, वे क्यों अपना ईमान खराब करें? वे अपनी जिम्मेदारी नियम-कायदे और ईमानदारी से निभाएंगे तो कोई उनका क्या बिगाड़ लेगा!

    थोड़े ही दिनों में ठेकेदारों के दावों को लेकर केवलबाबू ने दो-चार बार रामबाबू को बुलाकर यह हिदायत दी कि वे अपनी मन-मर्जी से ठेकेदारों के बिल न पेश किया करें - यह देखना उनका काम नहीं है कि किसे कब भुगतान मिले, उन्हें वही बिल भुगतान के लिए प्रॉसेस में लेने चाहिए, जिनको प्रस्तुत करने का आदेश दिया जाये। रामबाबू ने इसका यह समाधान निकाला कि जो भी बिल उनके पास प्रस्तुत किये जाने के लिए आयेंगे, वे उन्हें उसी क्रम में हैड-बाबू को प्रस्तुत कर देंगे, उनमें से किसे पहले पास करना है और किसे बाद में, इसका निपटारा हैड-बाबू अपने स्तर पर कर सकते हैं। हैड-बाबू ने इसका कोई सीधा उत्तर तो नहीं दिया, लेकिन निश्चय ही उन्हें रामबाबू का यह तरीका और रवैया कम पसंद आया। उन्होंने अपने चहेतों के बीच यह टिप्पणी करते हुए अपने मन का गुब्बार निकाला, ‘‘स्साला बाबू की टांग, खुद को ज्यादा होशियार समझता है! आने दो कभी लपेटे में, सब हेकड़ी भूल जाएगा।’’

    यह एक तरह से रामबाबू के खराब दिनों की शुरुआत थी। दूसरे बाबुओं या ठेकेदारों की मौजूदगी में छोटी-छोटी बातों को लेकर उन्हें झिड़क देना, उनके काम में बेमतलब की खामियां निकालना, अगर वे अपनी बात समझाने की कोशिश करते तो उन्हें फालतू का विवाद न करने की हिदायत देना या उनके द्वारा भेजी गई फाइल पर कोई अगली कार्यवाही न करना, अब रोजमर्रा की बात हो गई थी। रामबाबू अब आगे शिकायत भी करना चाहें तो किससे करें? मैनेजर वैसे ही उनसे कोई खास राजी नहीं था। फिर भी उन्होंने हिम्मत करके एकाध बार बात की, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। हैड-ऑफिस यों भी दूर जोधपुर में था, जहां कौन बात करता और उनका अपनी ओर से शिकायत करने का तो आधार ही क्या बनता? एकाध बार यह बात भी उनके मन में आई कि दफ्तर के इस माहौल और रंग-ढंग के बारे में पहले वाले हैड-बाबू सरदार अमरजीत के पास बात पहुंचानी चाहिए, जो अब हैड-ऑफिस में प्रशासनिक अधिकारी हो गये थे। यों केवलबाबू को भी इस बात की जानकारी थी कि रामबाबू सरदार अमरजीतसिंह की पसंद का आदमी है, इसलिए वे भी अपनी ओर से इतने सतर्क अवश्य थे कि बात हैड-ऑफिस तक जाने की नौबत न आए। कुल मिलाकर बात विवाद की थी और रामबाबू ने पिछले चार बरसों में यह बात समझ ली थी कि दफ्तर के विवाद में घाटा हमेशा छोटे कर्मचारी को ही उठाना पड़ता है। वे लगातार दफ्तर में अकेले पड़ते जा रहे थे और खींचतान बराबर बढ़ती जा रही थी।

 

*    

 

7.

 

    उस दिन सुबह-सुबह केवलबाबू ने जब रामबाबू को अपने कमरे में बुलाकर बधाई के स्वर में यह खबर दी कि उनका तबादला कंपनी के मुख्यालय में हो गया है, शायद सरदार अमरजीतसिंह ने निजी रुची लेकर उन्हें बुलाया दिखता है। रामबाबू यह खबर सुनकर एकाएक चिन्ता में पड़ गये। वे यह समझ ही नहीं पा रहे थे कि यह खबर उनके भले के लिए है, या उनसे उनका घर-गांव छुड़वाने की कोई चाल।

   रामबाबू को लगा कि हो न हो, इसमें केवलबाबू का ही हाथ रहा होगा। वही हर महीने जोधपुर दौरे पर जाते रहे हैं और हो सकता है उन्होंने ही कोई शिकायत की हो।

   ‘‘लेकिन मैं अभी परिवार को छोड़कर कैसे जा सकता हूं, बड़े-बाबू ? मेरी बूढ़ी मां है, छोटा भाई अभी घर में कुंवारा बैठा है और घरवाली की गोद में छोटी बच्ची...’’ रामबाबू ने अपनी घरेलू चिन्ताएं व्यक्त करते हुए कहा।

    ‘‘क्या बात करते हैं, रामबाबू ! नौकरी में कोई ये बातें देखी जाती हैं क्या? मुझे ही देख लो, मैं पैदा हुआ नागौर में, परिवार और बच्चे बीकानेर में बैठे हैं और मैं यहां अकेला बैठा तपस्या कर रहा हूं।’’

   ‘‘आपकी बात सही है केवलबाबू, लेकिन मेरी अपनी अलग तरह की मजबूरियां हैं।’’

   ‘‘मजबूरी की इसमें क्या बात है, रामबाबू ! अरे भई, आपके दो बड़े भाई यहां अच्छा- खासा घर बसाये बैठे हैं। जैसा आपने बताया, आपका छोटा भाई भी अब कोई बच्चा नहीं है, वह खुद अकेला घर संभाले जैसा है - आप तो पत्नी को भी यहीं अपने साथ रखना चाहते थे। वह बात ठीक है कि परिवार में जितने भी सदस्य होते हैं, उन सभी की अपनी-अपनी भूमिका होती है, लेकिन कंपनी की नौकरी के अपने कायदे-कानून हैं।’’ केवलबाबू ने अपना जीवन-दर्शन, मानस और फैसला जैसे एक ही सांस में सुना दिया था, ‘‘तो ठीक है, अब करो तैयारी। मुझे यों तो हैड-ऑफिस से यही आदेश है कि आपको तुरन्त रिलीव कर दूं, लेकिन मैं आपकी घरेलू परेशानी को देखते हुए आपको दो-चार दिन और रोक सकता हूं। आप शनिवार तक रिलीव होने की तैयारी कर लें।’’

    बाबू रामनारायण ने एक अन्दरूनी नजर से केवलबाबू के दाव का असर उनके चेहरे पर देखा और बिना कुछ बोले अपनी सीट पर लौट आए। उनके तबादले की खबर शायद ऑफिस में दूसरे सहकर्मियों को भी हो गई थी। अनुभाग में आते ही सभी की नजर उनके उदास चेहरे पर टिक गयी। ‘‘क्या हुआ हुआ रामबाबू, सुना है आपकी बदली हो गई?’’ ओमानंद का स्वर था, थोड़ी चिन्ता और हमदर्दी दिखाता हुआ-सा।

    ‘‘हां! आदेश तो आया बताया।’’ उसने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया।

    ‘‘अरे तो क्या हुआ उस्ताद, तबादले तो होते ही रहते हैं। यहीं देख लो, हम सभी बाहर से ही तो तबादले पर आये हैं। तुम्हारी पीठ पर तो सरदार साहब का हाथ है, यह कितनी बड़ी बात है। अन्यथा हैड क्वार्टर में कौन किस को बुलाता है?’’ गौतमबाबू ने जैसे अनायास ही धीरज बंधाने की कोशिश की।

   रामबाबू ने गौतम की इस बात पर दूसरे ढंग से विचार किया तो उन्हें भी लगा कि यहां किसी के आगे उदासी या चिन्ता प्रकट करना व्यर्थ है। सरदार अमरजीतसिंह उसके घरेलू हालात से अच्छी तरह वाकिफ हैं, फिर वे क्यों उसकी बदली करवाएंगे? यह तो निश्‍चय ही केवलबाबू की चाल है, लेकिन यहां कौन उसका हिमायती होगा?

    बेशक घर-परिवार वाले पास में हैं, लेकिन उससे क्या होता है? जहां सारा दिन काम करना होता है, अगर वहां का माहौल ठीक न हो, तो घर क्या कर सकता है।

    सारी परिस्थिति पर विचार करने के बाद रामबाबू शाम को बस से पीलीबंगा के लिए रवाना हो गये।

 

    घर में तबादले की बात सुनकर मां, गीता और हरि का चिन्तित हो उठना स्वाभाविक था। मां तो सुनते ही गहरे सोच में डूब गई और कहने लगी कि उसके यहां न रहने पर घर का काम कैसे चलेगा? उसका कहना था कि अगर हरि की शादी हो जाती तो वह एक चिन्ता कम हो जाती और घर को देखने-भालने वाला कोई हो जाता। बुढ़ापे में अब उसके लिए यह सब कर पाना आसान नहीं रह गया है। गीता की गोद में दूध-मुंही बच्ची है, वह भी अगर कुछ बड़ी हो गई होती तो मन में तसल्ली रहती। बड़े बेटों को तो इस घर की कोई चिन्ता-फिक्र ही नहीं रह गई है। उन्हें उलाहना देने से क्या लाभ! हरि काफी देर तक गुमसुम बैठा मां की बातें सुनता रहा। पति और मां की मौजूदगी में गीता वैसे भी भला क्या बोलती?

    मां को घर की पूरी मदद करने का विश्वास दिलाता हुआ वह उनके पास से उठ गया और अपने सोने के कमरे में आकर लेट गया। गीता रसोई का काम समेटती रही और हरि भी बिना कुछ कहे अपने कमरे की ओर चला गया।

    काफी देर बाद अपना काम निवेड़कर गीता जब कमरे में आई। रामबाबू पलंग के सिरहाने तकिये का सहारा लिये अधलेटी अवस्था में सो रहे थे। उनकी आंखें बंद थी। गीता के कमरे में आने से हल्की आहट होते ही उन्होंने आंखें खोलकर उसे देख लिया था। दीवार की खूंटी पर टंगी लालटेन अब भी जल रही थी। पलंग की दूसरी ओर कपड़ों में लिपटी उनकी बेटी नींद में सो रही थी। गीता पलंग के पायताने की ओर से आगे बढ़कर बच्ची को संभालने लगी तो वह हल्के-से कुनमुनाई और वापस सो गई। हमेशा की तरह आज गीता ने कमरे में आते ही लालटेन बुझाई नहीं थी। चेहरे की उदासी और अबोलेपन से रामबाबू को ऐसा लगा जैसे वह किसी चिन्ता में डूबी है। वह कुछ पल बच्ची के पास ही मुंह दूसरी ओर करके बैठ गई थी। उसके बोलने के इंतजार में वह कुछ पल उसकी ओर यों ही देखते रहे, तभी उन्हें हल्की-सी सिसकी सुनाई दी।

    वे पलंग पर सिरहाने सीधे होकर बैठ गये और फिर गीता के नजदीक सरक आए। उसकी पीठ पर बायां हाथ रखते हुए दाहिने हाथ से उसके चेहरे को अपनी ओर घुमाया तो वे देखते ही रह गये - गीता की आंखें आंसुओं से गीली थी और शायद काफी देर से रोने के कारण मुंह भी लाल-सा हो रहा था। रामबाबू ने उसके दोनों बाजुओं को थामकर उसे अपने सीने लगा लिया और उसकी पीठ थपथपाने लगे। कुछ देर इसी तरह अपने सीने से लगाये रखने के बाद उसके चेहरे पर नजर टिकाई और आंखों में आंखें डालकर पूछने लगे, ‘‘क्या हुआ? बदली की खबर से मन इतना कच्चा हो गया? अरे, नौकरी करने वालों के साथ यह सब होता ही है। मेरी तो अभी शुरुआत है, दफ्तर में जितने बाबू हैं, सारे यहां बदली पर ही तो आये हैं?’’ उसने धीमे स्वर में उसे समझाते हुए अपनी बात कही।

    ‘‘यहां नजदीक रहने से मेरा भी जी लगा रहता है। रोज घर लौट आने की उम्मीद बनी रहती है... लेकिन इतनी दूर चले जाने पर तो...’’ बात पूरी करने से पहले ही उसका फिर गला भर आया और आंखों से आंसुओं की धारा-सी बह चली।

   ‘‘अब नजदीक-दूर तो देख, मेरे हाथ की बात तो है नहीं। और वैसे जोधपुर कोई इतना दूर भी नहीं - महीने में एक-आध बार तो आ ही जाऊंगा।’’ रामबाबू ने फिर उसे तसल्ली देने की कोशिश की।

   गीता को इतनी कमजोर पड़ते हुए रामबाबू ने पहली बार देखा था। वे खुद भी चिन्ता में पड़ गये। उसे समझाते हुए बोले - ‘‘देख, मेरे भाइयों और भाभियों को तू अच्छी तरह जानती है। उन्होंने अपने-अपने घर अलग बसा लिये हैं। यह घर अपना है और तू इसकी मालकिन, यहां तुझे किस बात की चिन्ता! हां, हरि जरूर अभी छोटा है, वह थोड़ा बड़ा हो जाए तो घर और मां की जिम्मेदारी संभालने लायक हो जाएगा। देखा नहीं, बदली की खबर सुनकर कैसा गुमसुम हो गया था।’’

    रामबाबू की बात सुनकर गीता भी जैसे उसी चिन्ता में डूब गई। रामबाबू ने बात को आगे बढ़ाते हुए फिर कहा, ‘‘उसकी शादी हो जाती तो कोई चिन्ता की बात नहीं थी। साल-छह महीने बाद तो वह संयोग बैठ ही जाएगा। अभी तो सत्तो भी छोटी है, यहां दादी और चाचा की गोद में कैसी खुश रहती है।’’

    बच्ची का जिक्र आते ही गीता ने उसे गोद में उठा लिया और दूध पिलाने बैठ गई। रामबाबू भी उसकी ममता पर रीझकर फिर से तकिये पर सिर टिकाते हुए पलंग पर लेट गये। दूध पिलाकर गीता ने बच्ची को फिर से अपने बाएं बाजू उसी जगह सुला दिया और खुद पति की ओर करवट बदलकर उनकी बगल में लेट गई। आज पहली बार इतनी देर तक उन्होंने कमरे में उजाला रखते हुए बात की थी। रामबाबू ने ज्योंही उसे अपनी बाहों में समेटना चाहा, उसे एकाएक जलती लालटेन का ध्यान आ गया। वह बिस्तर से उठी और लालटेन बुझाकर अनुमान से वापस अपनी जगह पर लौट आई।

    रामबाबू ने अंधेरे में फिर से उसे अपने गाढ़े आलिंगन में बांध लिया।

 

*    

 

8.

 

     रिलीव होने के दो दिन पहले रामबाबू बड़े भाइयों को अपने तबादले की खबर दे आये थे। ऊपरी मन से तो उन्होंने इस बात पर चिन्ता ही जताई कि उसके जोधपुर चले जाने से पीछे घर में कितनी परेशानियां बढ़ जाएंगी, लेकिन मन में कहीं इस बात से खुश भी हुए कि कुछ बरस उसका घर से दूर रहना शायद उनके लिए ठीक हो। कहीं उन पर घर या मां की देखभाल की जिम्मेदारी न डाल दे, इस आशंका से बचने के लिए उन्होंने अपनी यह मजबूरी पहले ही जाहिर कर देना उचित समझा कि कारखाने की नौकरी छोड़ने के बाद अब उन्हें घर चलाने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है। हर रोज सुबह से रात होने तक वे अपनी दुकान के काम में लगे रहते हैं, तभी घर-खर्च लायक मजदूरी मुश्किल से पार पड़ती है।

    रामबाबू इस बात से भली भांति परिचित थे कि भाइयों के इस काम ने इन वर्षों में कितनी तेजी से रफ्तार पकड़ी है। दोनों ने अपने अपने मकान खड़े करवा लिये हैं। लकड़ी के काम के लिए बाहर दुकान भी बढ़ाकर बड़ी कर ली है। अब ऑर्डर पर मिलने वाले कार्यों को पूरा करने में उन्हें कहीं बाहर से लकड़ी लाने की जरूरत कम ही पड़ती है। दुकान में अब हर तरह की लकड़ी का अच्छा-खासा स्टॉक रहता है। दिन भर चार-पांच मजदूर-कारीगर तो काम पर लगे ही रहते हैं। यह ठीक है कि दोनों भाई खुद मेहनती हैं, लेकिन अपनी मां और सगे भाइयों से लुकाव-छिपाव की क्या जरूरत? सभी अपने भाग्य और मेहनत की रोटी खाते हैं। पिता की सलाह के मुताबिक अगर एक-दूसरे के प्रति थोड़ा-सा सद्भाव और घर में एकता का भाव रखें तो परिवार के सभी लोगों के मन में कितनी खुशी रहे, लेकिन यह इतनी-सी बात अब कौन किसे समझाए?

    रामबाबू शनिवार की शाम को ही अपना सारा सामान ट्रक में लादकर पीलीबंगा ले आये थे। ये आती हुई सर्दी के गुनगुने दिन थे....मार्गशीर्ष का महीना। दीवाली गुजरे कोई बीसेक दिन हुए थे। वे दो दिन गांव में रुके और घर के कुछ जरूरी काम निपटाए। तीसरे दिन वे अपने कपड़े-लत्ते, बिस्तर और गृहस्थी का कुछ जरूरी सामान लेकर सवेरे की बस से सूरतगढ़ आ गये, जहां से उन्हें बीकानेर की गाड़ी पकड़नी थी।

    यात्रा भले बस की हो या रेलगाड़ी की - रामबाबू उसका पूरा आनंद लेते। पूरे रास्ते वे खिड़की से सटे बाहर देखते रहते, जबकि यह सारा इलाका उनका भली भांति देखा-भाला था। सूरतगढ़ से रवाना होते ही पीपेरन, राजियासर और फिर महाजन का स्टेशन। रामबाबू की सलोनी ससुराल। गाड़ी रुकने से पहले ही वे डिब्बे के दरवाजे पर आ गये और वहीं खड़े-खड़े प्लेटफार्म की दोनों दिशाओं की ओर दूर-दूर तक नजर दौड़ाकर देखते रहे कि शायद कोई ससुराल के घर-परिवार का परिचित दीख जाए। लेकिन उन्हें कोई परिचित चेहरा नजर नहीं आया। वे नीचे उतरकर प्लेटफार्म पर एक चक्कर भी मार आये। इंजिन के सीटी बजाते ही वे फिर से अपने डिब्बे में चढ़ गये और गाड़ी महाजन से पार हुई तब तक डिब्बे के दरवाजे पर ही खड़े रहे।

    महाजन से पार होने के बाद रामबाबू को वाकई लगा कि घर पीछे छूट गया है। अब बीकानेर तक के स्टेशनों में उनकी खास दिलचस्पी नहीं रह गई थी। वे अपनी सीट पर खिड़की से लगे बैठे रहे। शाम को पौने छह के करीब गाड़ी लालगढ़ पहुंच गई। यहां से बीकानेर जंक्शन पहुंचने के लिए या तो शटल ट्रेन लेनी होती या प्लेट-फार्म से बाहर आकर कोई तांगा पकड़कर जंक्शन पहुंचा जा सकता था। उन्होंने तांगा पकड़ना ही बेहतर समझा।

    वे प्लेट-फार्म से बाहर आ गये। स्टेशन के बाहर कईं तांगे खड़े थे। एक तांगेवाले से किराया तय कर अपना सामान पीछे पांवों के नीचे रखकर वे पीछे की सीट पर बैठ गये। अगली सीट पर दो सवारी पहले से ही बैठी थी। तांगेवाला एक सवारी और लेना चाहता था, लेकिन जब प्लेट-फार्म की ओर से मुसाफिर आने कम हो गये तो वह तीन सवारियों को लेकर ही चल पड़ा। सड़क पर ट्रैफिक के नाम पर महज कुछ तांगे, तिपहिया वाहन, और साइकिलें ही दीख रही थीं - इक्का-दुक्का कार या जीप भी कभी दीख जाती, लेकिन हाथ-ठेले और ऊंट-गाड़े पूरे रास्ते बराबर दीखते रहे।

    कोई बीसेक मिनट चलने के बाद तांगा बीकानेर जंक्शन पहुंच गया। रामबाबू ने दो रुपये चुकाकर अपना सामान दोनों हाथों में उठा लिया। एक पेटी, थैला और बिस्तरबंद बस कुल जमा यही सामान तो था उनके पास। लंबी गालियों वाले उस थैले में कुछ खुला सामान था, जो उन्होंने अपने कंधे से लटका लिया, बिस्तरबंद को कंधे के ऊपर रख लिया और बाएं हाथ में पेटी का हत्था पकड़कर उसे उठा लिया। टिकट उन्होंने सूरतगढ़ से सीधे जोधपुर का बनवा लिया था, इसलिए उस तरफ से तो निश्चिंत थे। वे मुसाफिरखाने में आये और खाली पड़ी एक बैंच पर बैठ गये। सामान अपने पास ही रख लिया। मुसाफिरखाने की दीवार पर गाड़ियों का टाइम-टेबल अंकित था। उन्होंने एक नजर उस टाइम-टेबल पर दौड़ाई। जोधपुर जाने वाली गाड़ी रात दस बजे रवाना होनी थी, जबकि अभी तो शाम के सात ही बजे थे।

    हवा में हल्की ठंडक-सी थी, सो थैले में से अपनी लंबी बाहों वाली स्वेटर निकालकर उन्होंने पहन ली। कुछ देर सुस्ताने के लिए वे उस खाली बैंच पर लेट गये। बीकानेर में यों दो-चार घर रिश्तेदारों के भी थे, लेकिन वे शहर में दूर के मोहल्लों में थे। फिर इतना सामान लेकर किसी रिश्तेदार के घर जाना अच्छा नहीं लगता। ढाई-तीन घंटों की ही तो बात थी - इतना समय तो आते-जाते मुसाफिरों को देखते हुए ही बीत जाना था।

    जब दीवार पर लगी घड़ी में नौ बजे तो रामबाबू ने अपना सामान उठाया और वे प्लेटफार्म पर आ गये। चाय वाले खोमचे के पास सामान रखकर पहले कुछ भुजिये लेकर खाए और फिर एक कप चाय पी ली।

    साढ़े नौ बजे के आस-पास उन्हें गाड़ी प्लेटफार्म पर आती हुई दिखी। धीमी रफ्तार से चलती हुई गाड़ी के एक सामान्य डिब्बे में उन्होंने अपना सामान रखा और फुर्ती से हत्थी पकड़कर चढ़ गये। कई मुसाफिर उनसे भी अधिक फुर्तीले थे, जिन्होंने पहले ही डिब्बे में चढ़कर सीटों पर अपना कब्जा जमा लिया था। पर अभी गाड़ी में ज्यादा भीड़ नहीं हुई थी। रामबाबू को आराम से एक खाली सीट मिल गई। ऊपर वाली सीट पर उन्होंने अपनी पेटी और बिस्तरबंद इस ढंग से फैलाकर रख दिये कि पूरी सीट पर उन्हीं का कब्जा हो गया। ऊपर की सीट कब्जे करने के बाद वे निश्चिंत होकर नीचे की सीट पर बैठ गये। उनके पीछे-पीछे ही एक पति-पत्नी चढ़े थे। वे भी उसी कैबिन में उसी सीट पर सामान नीचे रखकर बैठ गये थे। रामबाबू को यह जोड़ा कुछ नया-नया-सा लगा। वे खिसककर खिड़की के पास बैठ गये। लोग लगातार आते जा रहे थे और देखते ही देखते कैबिन की सभी सीटें भर गई। पास बैठे सज्जन ने अपनी नवेली दुल्हन को दूसरी ओर बिठाकर खुद रामबाबू के पास सटकर बैठ गये थे, लेकिन सीट के दूसरे किनारे पर और किसी अनजान आदमी के आ बैठने के कारण वे शायद कुछ परेशानी महसूस कर रहे थे। रामबाबू ने उनकी परेशानी समझते हुए अपनी खिड़की वाली सीट दुल्हन के लिए खाली कर दी और खुद उसकी जगह पर आ गये। उन सज्जन ने मुस्कुराकर रामबाबू के प्रति कृतज्ञता प्रकट की और बातचीत की शुरूआत करते हुए अनायास ही पूछ लिया -      ‘‘आपका विराजना?’’

   ‘‘मेरा गांव तो पीलीबंगा है, भाईजी!’’

   ‘‘आगे कहां तक?’’

   ‘‘जोधपुर जाना है।’’

   ‘‘जोधपुर में कहां?’’

   ‘‘कहां का तो अब क्या बताएं, फिलहाल तो कल नये दफ्तर में ड्यटी ज्वाइन करनी है। फिर देखेंगे कोई ठिकाना।’’

   ‘‘कौन-से महकमे में नौकरी है आपकी?’’

   ‘‘फर्टिलाइजर कार्पोरेशन का नाम सुना होगा आपने?’’

   ‘‘फर्टिलाइजर कार्पोरेशन?’’ उसने चौंककर इस नाम को दोहराया और आश्चर्य से रामबाबू की ओर देखने लगा।

   ‘‘क्यों, आपको पसंद नहीं आया?’’ रामबाबू ने हंसते हुए पूछा।

   ‘‘लेकिन पीलीबंगा में तो एफ.सी.आई. का कोई दफ्तर नहीं है?’’

   ‘‘मैंने कब कहा कि है। मैंने तो यह बताया कि मैं वहां का रहनेवाला हूं।’’

   ‘‘और अभी तक पोस्टिंग कहां थी आपकी?’’

   इस पूछताछ में अब रामबाबू को भी कुछ रस आने लगा था और लगा कि इन सज्जन का भी कंपनी से कोई संबंध-संपर्क जरूर है। उनकी बात का उत्तर देते हुए बोले, ‘‘अभी तक तो हनुमानगढ़ था मैं!’’

   ‘‘यों कहो! अब आई न बात समझ में।’’ पूछने वाले को जैसे कुछ तसल्ली-सी हुई। गाड़ी के रवाना होने का समय हो गया था शायद। कुछ ही क्षण पहले इंजन ने सीटी बजाई थी। अगले कुछ ही पलों में गाड़ी धीरे-धीरे सरकने लगी। अब पूछने की बारी रामबाबू की थी, ‘‘आपका फर्टिलाइजर से क्या काम रहता है?’’

   ‘‘काम-और-धाम! आप आज ठीक मिले उस्ताद! अगर मेरा अनुमान सही है तो आप ही हैं रामनारायणजी!’’

   रामनारायण को अचंभा हुआ। गजब आदमी है, फकत् इकतरफा पूछताछ किये जा रहा है और अब तो इसने पहचान भी लिया, ‘‘हां भई, लेकिन आप मुझे कैसे जानते हैं?’’

   ‘‘जिस आदमी ने अपने हाथ से टाइपराइटर पर आपकी बदली का ऑर्डर टाइप किया हो, उससे आपका नाम अनजाना कैसे रह सकता है?’’

   ‘‘अरे वाह उस्ताद! तो आप भी मेरे जोड़ीदार ही निकले। क्या शुभ नाम है आपका?’’

   ‘‘मेरा नाम कल्याण है - कल्याणमल राठी। मैं इसी बीकानेर का निवासी हूं। यह मेरी जोड़ायत है, रूपा!’’ इतनी देर की बातचीत में पहली बार दोनों को ध्यान आया कि उनके साथ एक तीसरा सदस्य और भी है, जो इतनी देर से दोनों की बातचीत को दिलचस्पी से सुन रहा है। रामबाबू ने रूपा की ओर देखते हुए मुस्कुराकर हाथ जोड़ दिये। डिब्बे के पीले उजास में उन तीनों ने लगाव और स्नेह से एक-दूसरे को देखा और फिर उनके बीच दफ्तर की अगली-पिछली बातों का सिलसिला कुछ इस तरह से शुरू हुआ कि अगले दो घंटों तक उनका कोई आखिरी सिरा नजर ही नहीं आया। ढलती रात में गाड़ी अपनी रफ्तार से आगे बढ़ी जा रही थी। खिड़की के पास बैठी कल्याणमल की पत्नी को नींद की ज्ञपकियां आने लगी थी। रामबाबू ने अपनी जगह से खड़े होकर ऊपर की सीट पर रखा अपना बिस्तरबंद और पेटी उतारकर सीट के नीचे रख ली और कल्याणमल को सुझाव दिया कि वे रूपा को ऊपर सीट पर सुला दें। कल्याण ने अपने बैग से चद्दर निकालकर सीट पर बिछा दी और रूपा को ऊपर चढ़कर सो जाने को कह दिया। पहले तो रूपा ने मना ही किया, लेकिन फिर दोनों के आग्रह को मानते हुए वह ऊपर चढ़कर सो गई। रूपा को सुलाने के बाद वे दोनों मित्र फिर से दफ्तर की बातों में डूब गये। 

    कल्याणमल से ही रामबाबू को इस बात की जानकारी मिली कि उसके तबादले के पीछे केवलबाबू का ही हाथ रहा है। वे जोधपुर के मुख्यालय में पहले काम कर चुके हैं और इस बीच दो-तीन बार आ चुके थे। उनकी यहां के सीनियर मैनेजर से काफी पुरानी दोस्ती है, जिनके साथ केवलबाबू यू.डी.सी. के रूप में पहले काम कर चुके थे और बरसों उनके कमीशन एजेण्ट की जिम्मेदारी निभाते रहे थे। ‘‘खाने और खिलानेवाले लोग सभी दफ्तरों में मिल जाते हैं, रामबाबू! केवलबाबू तो आपको किसी उल्टी-सीधी जगह फंसाने की ही फिराक में थे, लेकिन ऐन-वक्त पर सरदार अमरजीतजी को इस बात का पता लग गया। उन्होंने ही आपको अपने पास हैड-ऑफिस में बुलवा लिया। वे वाकई आपसे बहुत स्नेह करते हैं।’’ यह कहकर कल्याणमल ने उनकी सारी शंकाएं दूर कर दी।

   सारी बातें जान-समझकर रामबाबू का चित्त कुछ हल्का-सा हो आया। गाड़ी नागौर और मेड़तारोड़ के बीच दौड़ रही थी। शीशे की खिड़कियां बंद होने के बावजूद डिब्बे में काफी ठंडक हो आई थी। उन दोनों ने अपने अपने थैलों से मोटे खेस निकालकर ओढ़ लिये और बैठे-बैठे ही नींद के हिलोरे लेने लगे।

*    

 

9.

 

   जोधपुर की पोस्टिंग रामबाबू के लिए एक नया अनुभव साबित हुई। मैनेजिंग डायरैक्टर से लेकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तक सभी तरह का काम करने वाले कोई तीन सौ लोगों का एक ही ऑफिस में साथ काम करना और उसी हैड-ऑफिस से सारे प्रदेश में फैले शाखा-कार्यालयों का प्रशासनिक प्रबंध देखना, कोई साधारण काम नहीं था। वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी श्रेणी के यहां कोई सात अधिकारी थे। सरदार अमरजीतसिंह ने रामबाबू को सीधे अपनी देखरेख में लेखा विभाग में ही रख लिया था। कल्याणमल भी इसी अनुभाग में था, इसलिए रामबाबू को ऐसा लगा ही नहीं कि वह किन्ही नये और अनजान लोगों के बीच आ गया है। जगह जरूर नयी थी और काम के स्वरूप और कार्य-शैली में काफी फर्क था, लेकिन काम करने का माहौल अच्छा था।

    जोधपुर उतरते ही कल्याणमल उसे आग्रह करके अपने घर ले गया था और अगले पांच-सात दिन तो वह उसी के यहां रहा। कल्याणमल पावटा में जालिमसिंह के हत्थे में ही एक दो कमरों का मकान किराये पर लेकर रहता था। संयोग से उसी के पड़ौस में एक छोटा मकान खाली हुआ था। रामबाबू ने तुरन्त उसे किराये पर ले लिया और कुछ जरूरी सामान लेकर उसमें रहना शुरू कर दिया।  

   सरदार अमरजीतसिंह उसकी सुख-सुविधा का पूरा ध्यान रखते। वे अपना परिवार साथ ही रखते थे। गुरमीत के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि उसे सी.ए. की पढ़ाई के लिए उन्होंने दिल्ली भेज दिया है। यहां अब वे दोनों पति-पत्नी और छोटी बेटी हरप्रीत रहते हैं। एक दिन रामबाबू जब उनसे मिलने घर गया तो उसे देखकर आश्चर्य हुआ कि हरप्रीत अब काफी बड़ी हो गई थी और यहां जसवंत कॉलेज में बी.एस.सी. सैकिंड ईयर की छात्रा थी। वह बचपन से ही शर्मीले स्वभाव की लड़की थी, लेकिन अब उस शर्मीलेपन का स्थान कौमार्यजनित लज्जा और संकोच ने ले लिया था।

   रामबाबू ने जोधपुर कार्यालय में अपनी ड्यूटी संभालने के बाद पूरे महीने में कोई छुट्टी नहीं ली थी। आमतौर पर नयी जगह पोस्टिंग होने पर कर्मचारी शुरूआत के दो-तीन महीने तो आने-जाने और अपना घर-बार जमाने में ही खर्च कर देते हैं, लेकिन रामबाबू को ऐसी जरूरत कम ही पड़ी। वे तो और एकाध महीना रुककर ही गांव जाते, लेकिन पिछले दिनों हरि का पत्र आया था कि मां ने उन्हें दो-चार दिन की छुट्टी लेकर तुरन्त गांव बुलाया है। उसने यह भी संकेत दिया था कि गंगानगर से कुछ मेहमान आने वाले हैं। रामबाबू ने तुरन्त बात का सार समझ लिया। इसका यही मतलब था कि हरि की सगाई का संयोग शायद जल्दी ही बैठ जायेगा। उन्होंने अगले ही दिन सप्ताह भर की छुट्टी के लिए आवेदन दे दिया और निजी तौर पर सरदार अमरजीतसिंह को घरेलू काम का ब्यौरा भी बता दिया। सरदार साहब ने उसे शुभकामना देते हुए उसकी छुट्टी मंजूर कर दी और उसी रात वह गाड़ी से रवाना हो गया। 

    रामबाबू के पीलीबंगा पहुंचने के दूसरे ही दिन गंगानगर से चार मेहमान दोपहर से पहले ही उनके घर पहुंच गये। उनसे पहले सवेरे ही हनुमानगढ़ से बड़े भाई लछमनराम भी आ गये थे। उन्हें मां ने मेहमानों के आने की खबर भिजवा दी थी। गंगानगर के इन मेहमानों में एक बुजुर्ग तो उनके रिश्तेदार ही थे और उनके साथ पचास-पचपन की अवस्था वाले तीन सज्जन और थे। बुजुर्ग राधाकिशनजी की उम्र कोई पैंसठ-सत्तर के बीच रही होगी, जो भवानीशंकर और कृपाशंकर के रिश्ते में चाचा लगते थे। वे अपने बड़े भतीजे भवानीशंकर की बेटी का रिश्ता लेकर यहां आये थे। इन्हीं के साथ सबसे कम उम्र के एक सज्जन और थे गणेशराम, जो लड़की के मामा थे। इस बारे में लछमनराम से पहले ही गंगानगर में इनकी बात हो रखी थी। लछमन का जब गंगानगर जाना होता, भवानीशंकर से उनकी मुलाकात जरूर होती। वे जी खोलकर उनकी आव-भगत करते। राधाकिशन की इस परिवार से पुरानी जान-पहचान थी, सो उनकी बात बद्रीराम का बेटा कैसे टालता? और टालने की बात ही क्या, वे तो खुद इसी इंतजार में थे कि जल्दी हरि का रिश्ता तय हो। रामबाबू पर मां का भरोसा यों भी कम होता जा रहा था कि वह जाने कब अपनी पत्नी को साथ ले जाने की बात कह सकता है। सो अगले दिन दोपहर से पहले ही मां और बड़े बेटे ने सगाई की रस्म पूरी कर लेने का मानस बना लिया था।

   घर में सब की इच्छा को देखते हुए रामनारायण ने भी यह रिश्ता मंजूर कर लिया। दोपहर बाद घर में गांव के भाई-बंधुओं और आस-पड़ोस के लोगों को बुला लिया गया और शाम तक हरि की सगाई की रस्म पूरी हो गई।

   भवानीशंकर की गंगानगर के बाजार में फर्नीचर की दुकान थी और नहरी क्षेत्र में तीन मुरब्बा जमीन भी। इस लिहाज से वे अपने रिश्तेदारों के बीच एक मध्यमवर्गीय आसामी के रूप में जाने जाते थे। राधाकिशन ने लछमनराम और रामनारायण को यह भी विश्वास दिलाया कि उनका भतीजा अपनी सामर्थ्य के अनुसार बेटी का अच्छा ब्याह करेगा। सगाई में भी उन्होंने सात-आठ हजार का खर्चा तो कर ही दिया था, जो उस जमाने के लिहाज से बड़ा खर्चा ही माना जाता था। रामबाबू को तो एक ही बात की तसल्ली थी कि चलो, हरि का घर बस जाएगा तो वह मां और उस पुश्तैनी घर की जिम्मेदारी संभाल लेगा। घर में नयी दुल्हन आ जाने पर गीता को भी जोधपुर साथ ले जाने की बात की जा सकेगी, अन्यथा अभी तो ऐसी बात कहे ही कैसे?

   सगाई होने के साथ चार महीने बाद आखातीज पर हरि के विवाह की तारीख पक्की कर चारों संबंधी उसी शाम अपने ठिकानों की ओर लौट गये।

   गीता और रामबाबू को इस बात का संतोष था कि हरि का विवाह हो जाने के बाद वे अपनी जिन्दगी नये ढंग से शुरू कर सकेंगे। छुट्टी के बचे हुए तीनों दिन अपनी आगे की जिन्दगी के मनसूबे बांधने में कब व्यतीत हो गये, दोनों को पता ही नहीं चला। इन तीन दिनों में उसने मां और भाइयों से विवाह की तैयारी के बारे में मोटे तौर पर बातचीत कर ली थी। विवाह को लेकर ज्यादा उन्हें करना ही क्या था। गहनों की पूर्ति मां के पास संचित निधि से होनी थी और भाइयों को तो शोभा के बतौर आंगन में आकर बारात के साथ खड़ा होना था। बाकी इंतजाम घर की परंपरा के अनुसार होने ही थे, जिसके लिए रामबाबू और हरि पहले से तैयार थे ही।

 

*    

 

10.

 

    रामबाबू जब पहली बार अपने परिवार को लेकर जोधपुर आए, उस वक्त तक सत्तो ने अपनी उम्र का दूसरा साल पार कर लिया था। वह पत्नी और बेटी को अपनी बनती कोशिश में हर तरह का सुख और आराम देना चाहता था, लेकिन एक बाबू की मामूली नौकरी के चलते जोधपुर जैसे बड़े शहर के खर्चों के आगे वह अपने को बेबस-सा अनुभव करता। हरि का छह महीने पहले ब्याह हुआ था। रामनारायण भी पहली बार पत्नी और बच्ची को साथ लेकर किसी बड़े शहर में आया था। वह तय नहीं कर पा रहा था कि उसे अपने परिवार को सदा के लिए अपने साथ रखना है या कुछ दिन साथ रखकर उसी पुश्तैनी घर में वापस भेज देना है। इसलिए घर में अपने हिस्से-बंटवारे की तो अभी बात ही क्या करता। वह जानता था कि बड़े भाई तो हिस्से-बंटवारे के लिए पहले से तैयार बैठे हैं। हनुमानगढ़ वाले घर और कारोबार को तो वे सिर्फ अपनी निजी कमाई मानते हैं। इसके अलावा पुश्तैनी जमीन में से उन्हें जिस हिस्से की उम्मीद है, उसे लेकर वे मां और हरि के रवैये से अच्छी तरह परिचित हैं। हरि सिर्फ रामबाबू का लिहाज करता है, अन्यथा बड़े भाइयों को तो जवाब देने को जैसे तैयार ही बैठा रहता है। अपनी भाभी गीता को वह भाई से भी अधिक सम्मान देता है। वह मां को पलटकर जवाब दे सकता है, लेकिन भाभी के सामने उसने कभी आवाज ऊंची नहीं की। रामबाबू इस बात को अच्छी तरह जानते हैं और इस बंद मुट्ठी को वे बंद ही रखना चाहते हैं। गीता खुद बहुत संतोषी स्वभाव वाली औरत है। जैसे उसे किसी से कुछ भी लेना-देना नहीं। वह तो पति की कमाई पर भी अपना अधिकार नहीं जताती। न उसने कभी यह जानने की कोशिश की कि उन्हें कितनी तनख्वाह मिलती है - उसे वह जो कुछ लाकर दे देते हैं, उसी में उसे घर चलाना होता है।

    जोधपुर में नौकरी के तीन बरस पूरे होते-होते रामबाबू को यह बात समझ में आ गई थी कि इन हालात में जोधपुर जैसे बड़े शहर में परिवार का पालन-पोषण आसान नहीं है। जोधपुर आने के बाद दूसरा साल पूरा होने तक गीता फिर गर्भवती हो गई थी। यहां वह अकेली थी और घर में कोई दूसरा मददगार भी नहीं था, इसी बात का खयाल करते हुए रामबाबू ने उसे बच्चा होने तक अपने पीहर छोड़ देना ही बेहतर समझा। गीता की मां और अपनी बड़ी बहन के वहां रहते प्रसव के लिए उसे वहीं भेजना उचित लग रहा था। बच्चा होने के करीब डेढ़ महीना पहले वह उसे वहां छोड़ आया था।

    इन्ही दिनों में रामबाबू को यह तय करना था कि उसे जोधपुर रहना चाहिये या कंपनी की किसी बाहरी शाखा में पोस्टिंग लेकर अपनी माली हालत सुधारने के लिए निकल जाना चाहिये। उसने अपने मित्र कल्याणमल से भी इस बारे में सलाह-मशविरा किया। कल्याणमल की भी यही राय थी कि खर्चा कम रखने की दृष्टि से तो बाहर के शाखा कार्यालय माफिक जगह होते हैं। बड़े शहरों की बनिस्पत कंपनी की बाहरी शाखाओं में कर्मचारियों को सुविधाएं भी अधिक मिलती हैं। सबसे बड़ी बात तो यह कि उनका मकान का खर्चा बहुत कम हो जाता है। सभी जगह कंपनी ने अपने अस्थाई आवास बना रखे हैं, पानी-बिजली का खर्चा भी बहुत कम आता है। न बड़े शहरों जैसे बाजार होते हैं और न ऊपरी चमक-दमक, जहां बहुत से खर्चे तो अनचाहे ही बढ़ जाते हैं।

    गीता के अपने पीहर जाने के डेढ़ महीने बाद एक दिन तार आ गया कि वह एक और बेटी का बाप बन गया है। समाचार सुनकर जाने क्यों उसके मन में कोई उत्साह नहीं पैदा हुआ। उसने कल्याण के अलावा यह खबर और किसी को नहीं दी। कल्याण को भी यह जानकारी मजबूरी में ही देनी पड़ी, क्योंकि उसे पता लग चुका था कि महाजन से कोई तार आया है। बच्ची होने के दो महीने बाद वह चार दिन की छुट्टी लेकर ससुराल पहुंच गया। ससुराल वालों ने जवाई बाबू के खूब लाड-कोड किये और उन्हीं के आग्रह पर गीता और बच्चियों को जोधपुर के लिए विदा कर दिया। गीता की तो यही इच्छा थी कि पहले अपने गांव जाकर मां और हरि से मिल आते, फिर जोधपुर पहुंच जाते, लेकिन रामबाबू छुट्टी कम होने का बहाना बनाकर उन्हें सीधा जोधपुर ले आये। गीता ने यहां आने के बाद हरि को पत्र लिखकर यह सूचना दे दी थी कि वह एक और भतीजी का चाचा बन गया है। रामबाबू को इस बात का पता तब चला जब जवाब में हरि ने उन्हें बधाई का पत्र भेजा था। उसने अपने पत्र में इस बात की शिकायत भी की थी कि वे महाजन तक आकर सीधे जोधपुर क्यों लौट गये? उन्हें एकबार बच्चों को लेकर पीलीबंगा जरूर आना चाहिए था। पत्र पढ़कर रामबाबू को थोड़ी झेंप-सी हुई, लेकिन गीता से उसने इसकी चर्चा नहीं की। उसने हरि का पत्र उसी को वापस सौंप दिया। सत्तो भी अब चार साल की हो गई थी। वह अपनी छोटी बहन को खिलाने-बहलाने और छोटे-छोटे घरेलू कामों में मां का हाथ बंटाने लगी थी। बस यही वह वक्त था जब रामबाबू को जिन्दगी का यह ढर्रा बदलने के लिए एक अहम फैसला लेना था और वह भी अकेले अपने बूते।

   संयोग से उन्हीं दिनों बाबुओं की डी.पी.सी. होनी थी। रामबाबू का भी उसमें नंबर आना था। एक दिन संकोच करता हुआ वह सरदार अमरजीतसिंह के कक्ष में मिलने चला गया और उनके सामने जाकर खड़ा हो गया। अमरजीत ने उसे कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए पूछ लिया, ‘‘हां, बोलो पुत्तर! सब ठीक तो है न?’’

   ‘‘जी बस, यों ही आपका आशिर्वाद लेने आ गया।’’ कहकर वह चुप हो गया। सरदार अमरजीत उसे हमेशा ही गुरमीत के अच्छे दोस्त के रूप में देखते रहे थे। उनके बीच अधिकारी और मातहत वाला औपचारिक रिश्ता कभी रहा ही नहीं। रामबाबू को चुपचाप बैठा देख उन्होंने यह अनुमान तो लगा लिया था कि वह कुछ कहना चाहता है, लेकिन शायद संकोच कर रहा है। उसे उत्साहित करते हुए फिर बोले, ‘‘हां हां, बोलो! हो तो चंगे ना, कोई परेशानी तो नहीं?’’

   ‘‘नहीं नहीं, प्राजी! कोई परेशानी नहीं है.... बस यों ही!... मेरे साथी बता रहे थे कि हम लोगों की डी.पी.सी. होने वाली है... शायद मेरा भी उसमें नाम है...’’

   ‘‘वो तो होगा ही, तैंनू कैड़ी फिकर हैगी...?’’ उन्होंने हंसते हुए उसे आश्वस्त किया।

   ‘‘फिक्र तो कोई खास नहीं है... बस एक अर्ज करने आया था...’’

   ‘‘हां हां, तो वो बात बोल ना।’’

   ‘‘यही अर्ज करनी थी कि इस प्रमोशन के बहाने अगर मेरा तबादला फिर से घर की ओर हो जाता तो मुझे अपना घर-बार संभालने का थोड़ा समय मिल जाता और बच्चों को भी परिवार का सहारा रहता...।’’

   सरदार अमरजीत उसकी बात सुनकर थोड़े गंभीर हो गये। एकाध मिनट सोचकर फिर बोले, ‘‘देख पुत्तर, मैं तेरे को और उस हनुमानगढ़ वाले हैड-बाबू को, दोनों को जानता हूं। मैं तेरे को यह सलाह नहीं दूंगा कि तू वापस जाके उसी झमेले में फिर से फंस जाए। भई जब नौकरी करनी है तो यों घर का मोह रखने से कैसे काम चलेगा? बीकानेर में वैसे भी यू.डी.सी. की कोई जगह खाली नहीं है, फिर बीकानेर और जोधपुर तो एक-सरीखे शहर हैं। ....तू तो ये बता कि कवास उत्तरलाई जैसी जगह के बारे में तेरा क्या खयाल है, इस वक्त कंपनी की सबसे बड़ी ब्रांच वही है और वहां तेरे जैसे मेहनती और जानकार आदमी की जरूरत भी है। ....उस गांव में स्कूल, अस्पताल, कॉलोनी, बाजार सभी तरह के सुभीते मौजूद हैं, खर्चा भी कम होगा और सब लोग तेरा मान रखेंगे...।’’

    सरदार अमरजीत के इस प्रस्ताव से रामबाबू फिर चिन्ता में पड़ गये। कवास ब्रांच की उन दिनों हैड-ऑफिस में काफी चर्चा थी। जो भी वहां से आता, उस जगह की सराहना जरूर करता। रामबाबू को चिन्ता में डूबा देख सरदार अमरजीत ने उसे तसल्ली देते हुए इतना ही कहा, ‘‘कोई जल्दबाजी की बात नहीं है, पुत्तर! घर में बहू से पूछ लेना और कल-परसों तक मुझे बता देना। नहीं जचे तो जहां बैठा है, वहीं एडजस्ट कर देंगे।’’

   सरदार अमरजीत के आश्वासन के बाद रामबाबू के चेहरे पर संतोष का भाव आ गया था। कुर्सी से उठते हुए उसने अपने हाथ जोड़ दिये। अमरजीत ने स्नेह दर्शाते हुए फिर पूछ लिया, ‘‘और बच्चियां कैसी हैं?’’

   ‘‘ठीक हैं प्राजी, सब आपकी मेहर है।’’ इतनी बात कहते हुए उसके मुंह पर फिर से मुस्कान तैर गई और वह उन्हें प्रणाम कर वापस अपनी सीट पर लौट आया। सरदार अमरजीत का प्रस्ताव उसे पसंद तो आया, लेकिन छोटी जगह की अपनी परेशानियों के कारण वह थोड़ा चिन्ता में भी पड़ गया। उसके मस्तिष्क में कई तरह के विचार घूमत रहे। आखिर शाम तक उसने अपना मन बना लिया कि प्रमोशन के बाद कवास जैसी जगह जाना ही उसके लिए बेहतर रहेगा।

    दूसरे सप्ताह प्रमोशन की सूची जारी हो गई और रामबाबू को यह देखकर तसल्ली हुई कि उसकी पोस्टिंग कवास हो गई थी। शाम को बाजार से मिठाई खरीदकर वह प्रसन्न मन से घर पहुंचा। गीता और सत्तो का मुंह मीठा कराते हुए जब उसने प्रमोशन की खबर दी तो गीता मन-ही-मन बहुत खुश हुई। लेकिन जब रामबाबू ने कवास की पोस्टिंग का जिक्र किया तो वह चिन्ता पड़ गई। उसकी समझ में कवास की पोस्टिंग का मतलब था, अपने ससुराल और पीहर वाले घर से बहुत दूर जा पहुंचना और एक दूरस्थ इलाके में अकेले पड़ जाना। वह हनुमानगढ़ जाने की इच्छुक तो नहीं थी, लेकिन अनूपगढ़, बीकानेर या गंगानगर की ओर बदली हो जाती तो उसकी नज़र में परिवार के लिए ज्यादा अनुकूल रहता। रामबाबू ने जब उसे यह बात समझाई कि नौकरी में कर्मचारी की खुद की मर्जी नहीं चलती, उसे वहीं जाना होता है, जहां कंपनी उसे भेजना जरूरी समझती है, तो वह थोड़ी उदास हो गई, लेकिन धीरज रखते हुए उसने हकीकत को मंजूर कर लिया।

    गीता इस बात पर क्या जिरह करती। उसके लिए तो पति का निश्चय ही उसका भविष्य और बच्चों का सौभाग्य था। दो दिन बाद रामबाबू कवास जाने के लिए हैड-ऑफिस से रिलीव हो गये। प्रमोशन की खबर के दूसरे ही दिन रामबाबू के साथ तरक्की पाने वाले आठ बाबुओं ने मिलकर अपने दूसरे साथियों और दफ्तर के लोगों को कंपनी के गैस्ट हाउस में एक बड़ी-सी पार्टी दी। इस पार्टी में पहली बार रामबाबू को अपने साथियों की मनुहार पर सबके बीच शराब के दो-तीन पैग पीने पड़े। यों चोरी-छुपे पहले भी कुछ दोस्तों के साथ बीयर और रम-व्हिस्की के दो-चार घूंट उन्होंने जरूर लिये थे, लेकिन कभी घर में गीता को इसकी भनक नहीं पड़ने दी। उस रात जब रामबाबू लड़खड़ाते हुए घर में दाखिल हुए तो उनके मुंह से आती शराब की गंध और उनकी हालत देखकर गीता का चेहरा उतर गया। वह शिकायत भी करती, तो किससे करती। उस रात पति-पत्नी पलंग पर साथ होते हुए भी एक-दूसरे से कोसों दूर रहे।

    आधी रात तक गीता पति की बगल में लेटे अन्दर-ही-अन्दर रोती रही और रामबाबू पीठ फेरे खर्राटे लेते रहे।

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11.

 

    इतने बरसों बाद आज रामबाबू को उस अभागी बेला पर बार-बार अफसोस हो रहा था कि वह उसी वक्त क्यों नहीं चेते। गीता यदि उनके बदलते स्वभाव और आचरण में आ रही दुर्बलता के लिए उसी समय टोक देती - उनसे झगड़ा करती, कोसती, घर-पीहर चले जाने की धमकी देती तो उनकी घरेलू जिन्दगी ऐसी परेशानियों और संत्रास में न बीतती,.....आज गीता का पूरा वजूद उन्हें इस तरह ललकारता हुआ न खड़ा होता उनकी आंखों के सामने, अपने अन्तःकरण में घुमड़ते, टीसते सवालों को अपने ही भीतर दबाये - अशान्त और अजेय। उसकी दुर्बल काया जैसे अब भी याद दिला रही थी कि यदि उसके पति या बेटे की कोई और कामना बाकी रह गई हो तो मन में पछतावा न रखें, अभी सांस अटकी हुई है, वह कसर भी पूरी कर लें! बेटा तो मां की इस अधमरी दशा में भी उसी चेष्टा में लगा है कि वह उससे यहीं मुक्ति पा ले, लेकिन उनके सोचे हुए को उलट देनेवाली यह बेटी सत्यवती हर बार आड़े आ खड़ी होती है, जो ऐन-वक्त पर पहुंचकर इनकी नीयत और मानसिकता पर फिर से पर्दा डाल देती है।

 

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    रामबाबू को अच्छी तरह याद है जब वे प्रमोशन के बहाने अपनी छोटी-सी गृहस्थी को साथ लेकर, पूरे रास्ते गीता को धीरज बंधाते हुए रेतीले टीलों के बीच बसे इस अपरिचित गांव की सीमा में जब पहली बार दाखिल हुए थे, तो खुद कितनी तरह की आशंकाओं से घिरे रहे थे। काहू खेड़ा क्षेत्र की पश्चिमी सीमा पर उभरता और चर्चित होता एक नया गांव कवास, जो बरसों पहले इस हलके में अंग्रेजी राज में आई रेलगाड़ी के ठहराव के लिए छोटे-से रेलवे स्टेशन के रूप में बसना शुरू हुआ था, आज वही छोटा-सा स्टेशन हलके का एक उभरता हुआ नामी कस्बा गिना जाता है।

 

    इसी कस्बे की पश्चिम दिशा में कोई आठ कोस के अन्तराल पर मालाणी हलके का बड़ा शहर है बाड़मेर - सीमान्त क्षेत्र का जिला मुख्यालय, जिसके चारों ओर कोसों पसरी पहाड़ियों और धोरों के बीच बसे ऐसे सैकड़ों गांवों की विरल-सी आबादी एक अलग तरह की जीवन-शैली का आभास देती है। आजादी से पहले इन गांवों में न पीने के पानी का कोई इंतजाम था और न आवागमन के साधनों का कोई पुख्ता बंदोबस्त। मारवाड़ की राजधानी जोधपुर से सिन्ध के सीमान्त हलके तक जाने वाली यही एक अकेली रेल लाइन थी, जिसे गर्मी के दिनों में आंधियां जगह-जगह इस कदर पाट देतीं कि उसे बचाने के लिए रेल महकमे को जोधपुर से मुनाबाव तक बारहमासी गेंग-समूहों का हर तीसरे-चौथे कोस पर पुख्ता इंतजाम रखना पड़ता था। कंपनी का काम शुरू होने से पहले इस हलके में बेरोजगार नौजवानों के लिए यही एक बड़ी मजदूरी की आस थी और यही उनके लिए विज्ञान का सबसे बड़ा चमत्कार कि सुबह-शाम हजारों मुसाफिरों को लाल-पीले डिब्बों में बिठाकर एक काला इंजिन धुंआ उड़ाता हुआ आता और क्षेत्र के निरापद जीवन में हलचल छोड़ जाता।

    लोग बताते हैं कि जब कवास में जिप्सम कंपनी का काम शुरू हुआ तो कुछ बरस आस-पास के गांवों के लोग फकत इसी कौतुक को देखने यहां आते कि उनके हलके में जिप्सम की खाने खोदने के लिए अजब तरह की मोटर गाड़ियां और मशीनें आई हैं, जो घड़ी-पल में जमीन का पेट चीर डालती हैं। दो घड़ी में अच्छे-भले धोरे को सपाट मैदान में बदल देती हैं और इनके कंटेनर में लदी रेत या मलबे को खाली करने के लिए किसी इन्सानी हाथ की जरूरत नहीं पड़ती। उसी बेढब वाहन को चलाने वाला चालक अपनी सीट पर बैठे-बैठे ही कल-यंत्रों से कंटेनर को एक तरफ से ऊंचा उठाकर किसी भी जगह जिप्सम या मलबे को उलट देता है।

     इतनी नयी चीजों के बावजूद लोगों का यह विश्वास कभी कम नहीं हुआ कि भले कितनी ही मशीनें आ जाएं, इन्सान का काम तो इन्सान से ही पार पड़ता है। कवास में जब यह कारोबार शुरू हुआ तो आस-पास के हजारों निवासी - किसान, खेतिहर मजदूर, कारीगर - अधेड़-जवान मर्द, औरतें रातों-रात इस कंपनी के आगार में आ बसे और देखते-देखते पचास-साठ घरों वाला कवास गांव हजार से भी अधिक घरोंवाला एक बड़ा गांव बन गया था। बाड़मेर, बालोतरा, बायतू, बाटाड़ू और छीतर जैसे बड़े कस्बों के व्यापारियों ने यहां अपनी दुकानें खोल लीं। रोज मालगाड़ी के साथ तीन-चार टंकियां पीने के पानी की आने लगी, जो रेलवे स्टेशन पर बनी भूमिगत हौदियों और टंकियों में खाली हो जातीं। जमीन के नीचे जिप्सम की मौजूदगी के कारण कवास के आस-पास के कुंओं और बेरियों का पानी इतना खारा होता कि उसे गले के नीचे उतारना किसी इन्सान के लिए तो क्या जानवरों के लिए भी कठिन हो जाता। इसके बावजूद क्षेत्र के अधिकांश  निवासी बरसों इन्हीं बेरियों का पानी पीकर अपने परिवार और जानवरों की प्यास बुझाते रहे।

   शुरू में कंपनी में मैनेजर, इंजीनियर, बाबू, मैकेनिक, चालक, चौकीदार, खलासी, हैल्पर, चपरासी आदि वर्गों के ज्यादातर कर्मचारी बाहरी क्षेत्रों से तबादले पर यहां आये थे। फिर धीरे-धीरे स्थानीय लोगों की संख्या बढ़ने लगी। बाहर से आये ये कर्मचारी अमूमन कंपनी के टीन की चद्दरों से बने अस्थाई आवासों में रहते थे, जो कस्बे के उत्तरी भाग में खुले मैदान में कॉलोनी के रूप में बनाये गये थे। इन कर्मचारियों के जीवन-निर्वाह और रोजमर्रा की बुनियादी सुविधाएं जुटाने में कंपनी को यहां अच्छा-खासा ढांचा खड़ा करना पड़ा। गांव में स्कूल नहीं थी, कोई डॉक्टर या दवाखाना नहीं था, डाकघर, टेलीफोन आदि की प्रारंभ में कोई व्यवस्था नहीं थी। गांव में सिर्फ एक आटा-चक्की थी, जो कंपनी के आने के साथ ही एक शहरी सज्जन ने अपने रोजगार के लिए लगाई थी। गांव और कंपनी के सभी घरों में आटे की पूर्ति इसी चक्की पर निर्भर थी। यह चक्की अपने पावर जैनेरेटर से चलती थी और जब यह चलती थी, तो दूर-दूर तक के इलाके में इसकी आवाज एक नई ताल की सृष्टि करती। जिप्सम कंपनी का कारोबार जमने के साथ यहां अच्छा-खासा बाजार कायम हो गया और बाकी सुविधाएं भी अपने स्तर पर धीरे-धीरे जुटने लगीं। शाम के वक्त जब कंपनी की कॉलोनी में बिजली के बल्ब जलते और क्वार्टरों में रोशनी होती तो एक अजीब समा बन जाता - पूरा कस्बा अच्छे-खासे शहर का आभास देने लगता। संयोग से स्टेशन और गांव सख्त जमीन पर बसे थे, जिसके नीचे जिप्सम और चिकनी मिट्टी की परतें थीं, इसलिए कॉलोनी और गांव में सड़क की सुविधा न होते हुए भी गाड़ियों के चलने-फिरने में ज्यादा कठिनाई नहीं होती। बाद के वर्षों में सड़कें भी बनवा दी गईं और कुछ दूसरी सुविधाएं भी आ जुटी थीं।

    रामबाबू जब पहली बार इस गांव में आए तो जोधपुर से रेलगाड़ी के रास्ते में धोरों की श्रृंखला देखकर उन्हें विश्‍वास ही नहीं हुआ कि इन धोरों के बीच कंपनी का इतना बड़ा कारोबार हो सकता है। जोधपुर जैसे बड़े शहर में रहने वाले इन्सान के लिए कंपनी की यह कॉलानी कोई बड़े अचरज की बात नहीं थी, उसे तो शहरी सुविधाओं के लिहाज से उसमें खामियां ही नजर आतीं, लेकिन रामबाबू खुद ग्रामीण संस्कार वाले आदमी थे और उनके अपने हलके के अधिकतर गांवों में जीवन की बुनियादी सुविधाएं प्रायः कम ही हुआ करती थी, इस लिहाज से उन्हें कवास पहली नजर में एक ठीक-ठाक गांव नजर आया और अपने मन में इस निर्णय पर संतोष प्रकट किया कि उनकी पोस्टिंग ठीक जगह पर हुई है।  

 

चौथी  किश्त ...अगले अंक में

 भाग -1  /  भाग - 2/ भाग 3


नन्द भारद्वाज
 

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