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ज़िम्मेदारी
कुछ लोग अपनी जिम्मेदारी को बोझ समझते हैं तथा कुछ लोग इसे अपने जीवन का उद्देश्य तथा अपनी जिम्मेदारी को अपना कर्म और कर्तव्य मानते हैं। यहाँ सवाल यह नहीं है कि कौन इसे क्या समझता हैं बल्कि सवाल यह है कि आखिर एक ही बात के लिए भिन्न – भिन्न नजरिया अपनाने से क्या प्रभाव पड़ता है ।
बोझ या जीने का उद्देश्य– हर काम के साथ ही जिम्मेदारी जुड़ी रहती है । अगर कहें कि जिम्मेदारी को ढंग से पूरा किये बिना किसी भी कार्य की सफलता की उम्मीद ही बेमानी है‚ तो यह गलत नहीं होगा । जिम्मेदारी को यदि स्वयं समझ कर पूरा किया जाये तो आत्म सन्तुष्टि, आनन्द और उल्लास महसूस होगा और जिम्मेदारी यदि पूरी करनी पड़ती है तो 'चलो यह काम भी पूरा हुआ' का अहसास हाथ आयेगा । अब यह बात तो स्वयं विचार करने की है कि काम जिम्मेदारी से होना चाहिए या बोझ समझ कर… और काम करने के बाद आप कैसा महसूस करना चाहते हैं…
जिस तरह किसी व्यक्ति की चर्चा के समय उसकी छवि ध्यान में आती है जिसमें उस व्यक्ति के आकार–प्रकार‚ उसके व्यवहार और उसके आचरण व परस्पर सम्बन्ध इन सभी बातों का अहसास होता है ।
जब चर्चा किसी बच्चे की हो तो उसकी मासूमियत‚ उसकी शरारतें उसका भोलापन इत्यादि स्मरण हो आता है । बात किसी मित्र या सज्जन की हो तो उसकी सज्जनता‚ उसका आचरण‚ उसका व्यवहार ध्यान में आता है और चर्चा अगर किसी शत्रु की हो तो उसकी ताकत‚ उसके हितैशी उसके व्यवहार अर्थात उसकी शत्रुता की बात ध्यान में आती है‚ उसी प्रकार जब भी किसी कामयाबी के बारे में या किसी कामयाब व्यक्ति के बारे में चर्चा की जाये तो समझ लीजिए इसके पीछे जिम्मेदारी का हाथ है‚ कामयाबी का सपना जिम्मेदारी को ढंग से पूरा किए बिना देखना बेमानी है । जब जब देश की स्वतंत्रता की चर्चा की जाती है तो उसमें जिन क्रांतिकारियों के नाम बच्चे बच्चे की जुबान पर होते हैं वह केवल इसलिए कि उन्होनें भी जो जिम्मेदारी ली‚ उसको बखूबी समझा और पूरे तन–मन व जान न्योछावर करने के लिए भी वो अपनी जिम्मेदारी से कभी पीछे नहीं हटे ।
जिम्मेदारी से करें‚ अपने स्वप्नों को साकार । काम चाहे छोटा हो या बड़ा उसे जिम्मेदारी से करने का मजा ही कुछ और होता है‚ जिम्मेदारी से काम करने वालों में ही विवेकशीलता‚ आत्मविश्वास व सकारात्मक सोच की अमूल्य धरोहर उनका मार्ग प्रशस्त करते हुए स्वयं उनके कार्य में कामयाबी की मिसाल बन कर सदैव उनका मनोबल उंचा रखती है । पूरे मन से किये गये कार्य ही सही परिणाम पाने का माध्यम बनते हैं और सदा नये से नये आयाम मन से किये जाने वाले कामों में ही सामने आये हैं । जितने भी आविष्कार आज हमारे सामने हैं उनको करने वाले भी साधारण इन्सान थे‚ पत्थर को पहाड़ से लुड़कते देखकर पहिए की सोच व नया रास्ता तलाशने वाला भी इस बात से एक नया विकल्प खोजने में जब जुट गया तो ही परिवहन के लिए यह सशक्त माध्यम सामने आया ना । नई – नई तकनीके नये नये आविष्कार और हर तरफ से दिनो दिन प्रगति के नये रास्ते आज तभी सामने आ रहे हैं क्योंकि आज हमें जिम्मेदारी की समझ का अहसास है।
यदि अपनी जिम्मेदारी को पूर्ण किए बिना किसी चमत्कार की उम्मीद करें तो यकीनन बेमानी और निरर्थक होगी।
समझ का फेर…
आज कोई भी व्यक्ति‚ संस्थां‚ समाज या देश अपनी जिम्मेदारी को समझे बिना कुछ भी हासिल नहीं कर पायेगा । एक छोटा सा देश जापान जिसे पूरी तरह से तहस नहस करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी गई‚ वह फिर‚ और पहले से भी कहीं अधिक उन्नत रूप में विश्व भर में अपना स्थान बनाये हुए है – किस दम पर ? यकीनन अपनी जिम्मेदारी को उद्वेश्य समझ कर ही तो । दूसरी और कुछ ऐसे बहुत से उदाहरण भी आये दिन सामने आते रहते हैं जहॉं जिम्मेदारी की बात ही नज़र नहीं आती‚ उनको गिनवाने से आपको कुछ हासिल नहीं होने वाला‚ इसलिए जरूरत इस बात की है कि आप अपनी जिम्मेदारी को पूरी करने में कोई कसर बाकी न रहने दें‚ यदि यह आपको बोझ लगती हो तो यकीनन आपको इस बारे में आगे कुछ भी पढ़ना बेकार है‚ आप इसे बंद करे और चेन की नीद लो वही ज्यादा बेहतर होगा । क्योंकि जब आप अपने आचरण या व्यवहार में कोई फर्क लाना ही नहीं चाहते तो कम से कम अपना समय तो बर्बाद न करें । पुरातन काल में कितनी लडाईया होती रहीं‚ जहॉं जिम्मेदारी से काम हुआ वहां जीत हुई और जब जब जिम्मेदारी ठीक ढंग से पूरी नहीं हुई परिणाम में मिली – हार !
इस बात में कोई संदेह नहीं कि ब व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी अपनी इच्छा से लेता है तो वह उसकी ताकत बन जाती है और जीवन जीने का उद्देश्य बन जाती है पर जब यह लेनी पड़ती है तो बोझ का एहसास होता है । यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम आज छोटे छोटे बच्चों के कंधो पर ही बस्तों का बड़ा बड़ा बोझ लादकर शुरू से ही शिक्षा को बोझ बनाने पर आमादा हैं – काश ऐसा हो कि शिक्षा के स्तर व बच्चों पर बढंते बोझ की जिम्मेदारी को भी आगे बढ़कर समझने की कोई राह निकल पाती‚ और उनकी किताबों का दायरा केवल स्कृल ही रहता व 'भारी भरकम' बस्तों व 'होमवर्क' की चिंता व तकनीक के दुरूपयोग के बजाय बच्चे केवल नई सीख एवं जिम्मेदारी के अहसास को समझ पायें।
इसलिए अपने भविष्य को‚ जिम्मेदारी समझाने से पहले‚ अपने वर्तमान यानि स्वयं आपको जिम्मेदारी को समझना होगा और ‘जिम्मेदारी लेनी पड़ रही है’ की स्थिति से ‘जिम्मेदारी लेना चाहता हूं’ की स्थिति पर आना होगा । अगर आप पहली स्थिति में जरा सा भी खुद को धिरा हुआ महसूस करते हैं तो इसे बार बार पढ़े और जिम्मेदारी लेने की बात सोचेक्योंकि बदलाव की आपको बहुत जरूरत है । सवाल जिम्मेदारी के अहसास का है जिसे सारांश में कहें तो अपनी हालत एवं हालात की जिम्मेदारी यदि आप स्वयं पर लेंगें‚ तभी इनमें सुधार आयेगा ।


पी. जे. सिंह


जिम्मेदारी
हम डरते क्यों हैं
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