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यौन शोषण

पिछले दिनों बोलोजी में विवाहपूर्व सेक्स तथा यौन शोषण विषयों को लेकर छपे कुछ लेखों की सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों ही प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुईं। फिर बोलो जी की कहानियों में वर्णित विवाहपूर्व तथा विवाहेतर सम्बंधों को लेकर दोहरे मापदण्डों के आरोप भी एक दो पाठकों से मिले। कृष्ण आदित्य जी ने लिखा कि‚ " बोलो जी की लेखिकाएं लेखों में कुछ और अभिव्यक्त करती हैं‚ कहानियों में कुछ और ।" एक सीमा तक आदित्य जी सही कहते हैं किन्तु वे भूल रहे हैं कहानियां और लेख दो अलग विधाएं हैं‚ दोनों की प्रेरणाएं अलग हैं‚ माध्यम अलग हैं और एक अप्रत्यक्ष है दूसरा प्रत्यक्ष।

फिर उनके पत्र पर कुछ अच्छी प्रतिक्रियाएं भी मिलीं जैसे अंकुश मौनी जी ने लिखा कि " जीवन से कहानियां उपजती हैं‚ कहानियों से जीवन कम प्रभावित होते हैं। एक गड्ढे में गिर चुका भुक्तभोगी पात्र अपने संवाद के जरिये‚ अपने मनोविज्ञान को उजागर करता हुआ औरों को सीख ही देता है।"

कहानियाँ पात्रों के माध्यम से जीवंत होती हैं‚ जिन्हें पाठक जैसे चाहे समझे‚ जैसे चाहे ले। लेख एक प्रत्यक्ष सम्वाद हैं। लेख लिखते समय लेखक एक नैतिक दायित्व महसूस करता है‚ वही लेखक कहानी लिखते समय पात्रों के जीवन‚ उनके परिवेश‚ परिस्थितियों को और उनकी मानसिकता को उकेरता है‚ वहां वह कोई सीख नहीं दे रहा होता वह उन पात्रों के घटनाक्रम में गुंथी परिस्थिति को कहानी में बांध रहा होता है। जीवन हज़ारों हज़ार अच्छी बुरी कहानियों को उत्सर्जित करता है आवश्यक नहीं कि वे सारी कथाएं प्रेरक कथाएं हों,  हां लेखों में एक प्रत्यक्ष नैतिक दायित्व निहित होता है कि वे समाज को सही दिशा दिखाएं।
 

बोलो जी में छपे लेखों के प्रति सम्पादक का नैतिक दायित्व बनता है कि वह सही दिशा दिखाते‚ सही तथ्य बताते लेखों को ही सम्मिलित करे लेकिन कहानियां तो कहानियां हैं वो जीवन का प्रतिबिम्ब हैं‚ उन्हें सम्मिलित करते समय सम्पादक उनकी मौलिकता‚ पठनीयता और भावप्रधानता की ओर ध्यान देता है। लेखक इन पात्रों को समाज ही से उठाता है जो कि अपने अवचेतन से जूझ रहे होते हैं‚ जो परिस्थितियों के जाल में उलझे होते हंै। प्रेम को खोजता हुआ भटकता है।
यौन शोषण पर लिखे गये लेख पर भी कुछ पाठकों की प्रतिक्रिया मिली कि आप पुरुषों को आरोपित कर रहे हैं। ऐसे में मैं इतना ही कहना चाहूंगी कि लेख में पुरुषों के सम्पूर्ण वर्ग को कतई आरोपित नहीं किया गया है। केवल कुछ पुरुषों के बारे में जो यौन शोषण के अपराधी हैं उन्हीं के बारे में लिखा गया है। लेकिन उन पुरुषों को समाज में पहचान पाना बहुत कठिन है वह किसी भी चेहरे के पीछे हो सकते हैं।

 

शोषित युवक को तो समाज में फिर भी स्थान मिल जाता होगा‚ लेकिन शोषित बालिका‚ युवती या स्त्री को समाज हेय दृष्टि से देखता है‚ उसके विवाह में यही शोषण रुकावट बन जाता है।

माना किशोर बालक भी महिलाओं द्वारा शोषित होते हैं‚ पर ऐसे कुछ केसेज़ के बाद भी बालिकाओं और महिलाओं के यौन शोषण के आंकड़े बहुत अधिक हैं प्रतिशत में। और एक महत्वपूर्ण बात कि शोषित युवक को तो समाज में फिर भी स्थान मिल जाता होगा‚ लेकिन शोषित बालिका‚ युवती या स्त्री को समाज हेय दृष्टि से देखता है‚ उसके विवाह में यही शोषण रुकावट बन जाता है। अब हमारा समाज सदियों ही से ऐसा है‚ और इसे बदला नहीं जा सकता तो क्या किया जा सकता है? कितने पुरुष होंगे ऐसे जो आज भी किसी बलात्कृत युवति से विवाह करने को तैयार हो जाएंगे? बहुत दुर्लभ ही ऐसे युवक मिलेंगे।

बोलोजी फेमिनिज़्म के नारे लगाने वाली पत्रिका कतई नहीं है‚ न ही इसकी लेखिकाओं का इरादा पुरुष वर्ग को आरोपित करने का है। मात्र कुछ लेखों या कहानियों से पत्रिका के मिजाज़ को समझना तो कठिन है ही‚ साथ ही एक दो लेख या कहानियों से लेखक के मंतव्य को समझना भी कठिन है।
हम अच्छी तरह जानते समझते हैं कि पुरुष और स्त्री के समानान्तर चलने का ही नाम जीवन है। स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं। और समाज के प्रति दोनों का बराबर का दायित्व है क्योंकि समाज दोनों से बनकर दोनों को पहचान देता है।

– मनीषा कुलश्रेष्ठ

इसी संदर्भ में :
कार्यालय में यौनशोषण
दिव्य प्रेम
यौन उत्पीड़न
यौन सम्बंध और दाम्पत्य
यौन शोषण
विवाह से पूर्व शारीरिक सम्बंध
लिखते लिखते

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