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भाग-8
तत्त्वमसि
नदी
   

''कितना कॉम्पलेक्स है जीवन.......'' मैं पता नहीं, किससे कहती हूं ? उससे या अपने-आपसे ? या अपने अंदर उठ रहे उस सन्नाटे से, जिसे हम भरने की कोशिश करतें हैं सिर्फ और भर नहीं पाते। वह हर पल अपनी मौजूदगी का अहसास दिलाता रहता है.......

वह प्यार से मेरा हाथ सहलाता है। मैं उसके कंधे से सिर टिका कर बैठी हूं........

''विसंगत स्थितियों में संगत की तलाश।'' यही है जीवन। यही है समर सत्ता। जागरूकता है यह। जीवंत बनाती है अस्तित्व को। 'कांस्टेंट कांटेप्लेटिव थिंकिंग।' .......मानसी, एक स्थिर जलाशय से ज्यादा कीमती लगती है उफनती हुई नदी........।''

उसकी आवाज के बहाव में मैं स्वयं को ढीला छोड़ देती हूं..........

कभी होता है कि उसके अंदर उठने वाली किरणें मुझे भी हिलाती हैं। कभी उसके अंदर फैली शून्यता मेरे भीतर भी छाने लगती है और मैं चाहती हूं खाली हो जाना ताकि जो बरस रहा है मुझ पर उसे मुझमें पूरी-पूरी जगह मिल सके......।

''और ज्वार-भाटों से अटा-पटा, भांय-भांय करता सागर-कितना उत्तेजित करता है मन को ?''

जान रही हूं सिध्दार्थ, सागर की विवशता, पर क्या करूं मैं क्या........?

''तीव्र संवेगा: आसन्न: समाधि.......।'' तीव्रतम संवेग, आसन्न हों, सन्निकट हों 'फेस टु फेस', हो गए हो हम, तब इस 'दृष्टि-सृष्टि' से सूक्ष्मतम में 'जंप' होना ही है। तत्क्षण। तुरंत। और इसी क्षण के लिए, इसी काल के लिए सारे प्रयास हैं हमारे।''

''जिस काल में व्यक्ति संपूर्ण कामनाओं को त्याग देता है। यही कहते हैं कृष्ण और तुम भी....... पर सिध्दार्थ, क्या यह संभव है ?''

मैं उसके कंधे से चेहरा उठाकर उसे देखती हूं - खुद भी तो उसी सबसे संघर्ष कर रहे हो, जिससे मैं.......। बल्कि, किसी पल तो लगता है, तुम्हारा संघर्ष, मुझसे भी कहीं गहरे तल पर है।

वह मुझे देखता है....... अपनी गर्म निगाहों से-

''काल तो प्रभाव है मानसी। घटनाक्रमों का। सवाल कामनाओं के त्याग का उतना नहीं है। काल के प्रभाव से नि:स्पृह रहने का है। काल का प्रभााव तुम पर पड़े, औश्र फिर भी न पड़े- 'पद्मपत्र विमांभसा' काल निरपेक्ष हो जाता है तब और तब भी उस निरपेक्ष से साक्षात्कार होता है तुम्हारा। जो तुम ही हो.......।''

मुझे कुछ याद आता है-

'' 'य: सर्वत्र अनभिस्नेह:............।' जो व्यक्ति स्नेहरहित होता है, उसकी प्रज्ञा स्थिर है........।''

''बहुत गहरे 'आत्म-बंध' में है जो। गहनतम 'भावसंबंध' में जो है.......।'' वह तने से सिर टिकाए कहीं दूर देख रहा है..........खोया-खोया सा--

''दुर्निवार प्रेम हो जिसका। वह अनभिस्नेह में ही है मानसी। वीतरागी है वह। वह 'स्थितप्रज्ञ' है। .......स्नेहरहित नहीं है कृष्ण। कृष्ण जैसा व्यक्ति स्नेहरहित हो भी नहीं सकता। अनभिस्नेही है वह।''

''और तुम, सिध्दार्थ.....।'' मैंने उसका चेहरा अपने सामने कर लिया......। उसकी आंखों में इतना तेज है कि मेरी आंखें सामना नहीं कर पा रहीं......। फिर भी मैं अपनी निगाहें हटाती नहीं.......मैं तुम्हीं में बहना......तुम्हीं में विलीन हो जाना चाहती हूं सिध्दार्थ।'' एक कामना मेरे अंदर लहर की तरह उठी....। मैंने उसके चेहरे की गर्माहट अपनी उंगलियों पर महसूस की--

''द एक्सेस इज ऑलवेज हॉलो।'' वह मुझे ही देख रहा है-- अपनी उन्हीं तपती निगाहों से।

''वह जो अतिरिक्त होता है, हमेशा ही 'अनभिस्नेह' में होता है वह। यही है प्रेम.....। एंड व्हाट इज हॉलो, इज नेवर इन एक्सेस..... वह जो विषयासक्त है, स्नेह रहित भी हो सकता है, कई मौकों पर।''

मैं नहीं सह पाई और मैंने अपनी निगाहें परे कल लीं--

''व्यक्ति जब विषयों का चिंतन करता है, विषयों के प्रति आसक्ति पैदा होती है तब, 'ध्यायतो विषयान् पुंस:' ......और यही आसक्ति समस्त कामनाओं की जड़ है, और अतृप्त कामनाएं, विकारों को जन्म देती हैं--इनसे ही तो हटना है।''

मैंने स्वयं को कहते सुना।

''हटना आसान भी नहीं है, आवश्यक भी नहीं। और फिर.......विषयों को पकड़ना या उनसे हटने का प्रयास, दोनों ही 'विषयों' का चिंतन हुए.......। पूरी जिंदगी गुजर जाती है मानसी पकड़ने और छोड़ने में। सवाल 'विषयों' का नहीं है, 'विषयी' का है......।''

उसकी आवाज मुझे छूती है और ठिठकी खड़ी रहती है।

''विषयी को पकड़ो। विषय छूटेंगे ही, कह रहे हो तुम। क्या आसान है यह? 'इंद्रियाणि प्रमाथीनि, प्रसभं मन:।'' मेरी आवाज में फिर बेचैनी भर रही है।

''हां मानसी, ये प्रमथन स्वभाव वाली इंद्रियां, विषयों की ओर उन्मुख करती हैं बार-बार......। 'बलादिव नियोजित:'। बल से हर लेती है हमें। हमारी निजता को। गुलाम हैं हम इनके। इसीलिए, कहते हैं कृष्ण........'आत्मवश्यै: विधेयात्मा'........'अपने अंतस की यात्रा पर निकला हुआ व्यक्ति'.......विषय से हटकर विषयी का चिंतन करने वाला व्यक्ति....''

उसका स्वर बेहद गंभीर है........। आसपास कोई दिख नहीं रहा दूर तक........। किसी क्षण लगता है..... ये वृक्ष, ये पक्षी...... ये हवा में उड़ते हुए पत्ते और ये मैं...... हम सब उसी को सुनने इकट्ठे हुए हैं........। पर फिर किसी क्षण यह भाव लुप्त हो जाता है। मुझे कुछ दिखाई नहीं देता सिवाय उसके चेहरे के........। मुझे कुछ सुनाई नहीं देता सिवाय इन शब्दों के- 'मानसी, ऑय लव यू।' और मैं खुद को किसी एक जगह रखने की नाकामयाब-सी कोशिश करने लगती हूं.....

''कछुआ, जैसे, अपनी इंद्रियों को समेट लेता है, वैसे ही, अपने आपको इंद्रियासक्ति और विषयासक्ति से समेट लें हम।''

मैंने समझते हुए कहा।

''तभी हैं हम पूर्ण काम.......।'' वह मुस्कराया-काफी देर बाद और मैं उस मुस्कान की झिलमिल रोशनी में ढूंढ़ने लगी खुद को-

''पूर्ण काम.....।'' मैंने कहने के लिए कहा।

''हां, जहां ब्रह्मचर्य भी, कामना भी, शरीर भी, मन भी, सबकुछ। जीवन जहां कंटाडिक्ट्री हो जाए। जीने लगें हम अपने स्वभाव पर। हर आदत छूट जाए, विधि की भी, निषेध की भी। पूर्ण काम हैं हम।''

''.......और आप्तकाम ? ''मैंने पूछा।

''मानसी, चार प्रश्न पूछना है तुमसे और एक एडिशनल प्रश्न। कुल पांच।'' उसने मुझे ध्यान से देखते हुए गंभीर स्वर में कहा-

''जवाब भी देना पड़ेगा।''

''व्हाई नॉट ? पूछो।''

मैंने उसके देखने को देखा..... हमेशा की तरह--

''सुखी कौन है ? आश्चर्य क्या है ? मार्ग क्या है ?''

''और....।'' मैंने कहा।

''वार्ता क्या है ?''

और पांचवां.......।''

''पांचवां...... व्हाय आर यू सो सबलाइम्ली, ब्यूटीफुल ?''

''सिध्दार्थ, एक बात पूछूं ?''

धूप उस पेड़ से दूर चली गई है, जिसके नीचे हम बैठे हैं। हवा में हिलते हुए सूखे पत्ते जब टूटकर गिरते हैं.....मैं उनका गिरना देखती हूं.....। टूट जाने और गिरने के ठीक बीच उनकी एक निहायत अलग किस्म की दुनिया होगी। दुनिया नहीं, एक अलग किस्म की ऐसी जगह........ जिसकी बाबत कुछ सोचने से पहले ही वे जमीन छू लेते हैं.......।

मैं अपनी गोद में आ गिरी एक सूखा पत्ता देखती हूं....... सबकुछ खो चुकने के बाद की आखिरी अवस्था.......।

''पूछो मानसी.......।''

मैं उसका चेहरा देखती हूं। पेड़ के तने से वह अपनी टांगें लंबी किए आराम से बैठा है...... आपने आपमें स्थित.....चुप........ खामोश.....

''सिध्दार्थ, मैं जब भी तुम्हारे अतीत के बारे में पूछती हूं, तुम टाल जाते हो........। कभी-कभी में सोचती हूं, कुछ भी तो नहीं जानतीं मैं तुम्हारे बारे में........। वे परिस्थितियां, जो एक इनसान को यहां तक ले आती हैं.......। तुम्हारे जैसा इनसान....।''

''मेरे जौर इनसान, क्या है मुझमें मानसी।''

''क्या नहीं है सिध्दार्थ........। देवत्व की सीमाओं को छूता हुआ एक ऐसा इनसान....। तुम्हें छू भर लेने से....... इतना पवित्र हो जाता है सब.......। एक ऐसा आलोक है तुममें.........।''

मुझे लगा, मैं कुछ भी ठीक से कह नहीं पा रही हूं........। एक साथ इतनी बातें आ रही हैं मन में कि सब गड़बड़ाए जा रहा है.........।

'' अब आप यह सब बंद करें, तो मैं कुछ अर्ज करूं.....।'' वह मुस्करा रहा है।

''मैं बंद ही कर रही हूं। एक तो मैं कह नहीं पा रही- मतलब मेरे सामर्थ्य के बाहर की बात है.......। दूसरे मुझे तुमसे सुनना है। बतलाओगे न सिध्दार्थ...... आज ही..... फिर पता नहीं कब इस तरह का वक्त मिले....। न मिले.....।''

आखिरी दो शब्द मैंने बहुत धीमे स्वर में कहे।

''मुझे बताना ही है मानसी। मैं जानता हूं। तुम्हें नही ंतो और किसे बताना है ? आज यहां हूं, पता नहीं, कल कहां रहना है ? अभी यहां हूं तुम्हारे साथ, पता नहीं कल किसके साथ ?''

''किसके साथ ?'' मैंने चौंककर उसे देखा।

अब वह जाने की बात करने लगा। पता नहीं क्यों लग रहा था कल से, किसी भी क्षण वह कह सकता है- मानसी, मुझे जाना है। बहुत ध्यान से देखें- तो जो कुछ भी घटित होता है, अपने आगमन की सूचना वक पहले ही दे देता है। हम ही कभी सोये हुए होते हैं, कभी कहीं और उलझे होते हैं- और वह पल गुजर जाता है, हम पकड़ नहीं पाते।

''जीवन है यह। बहाव है। अतीत बह जाता है। नया जल आने को है। मैं तो वहीं हूं। 'तटबंध' बनकर। 'तृतीय क्षण ध्वंस प्रतियोगी'''

उसके साथ बातें करते हुए इस वक्त मुझे बहती नदी के साथ चलने जैसा प्रतीत हो रहा है। वह नदी, जो अंतत: हमारे ही भीतर गिरती है और हममें ही विलीन होती है.....।

उसकी आवाज की ध्वनि-तरंगे आहिस्ता-आहिस्ता चारों तरफ फैल रही हैं........। यह सब वृक्ष के पास से गुजरेंगी, वृक्ष ले लेगा उन्हें अपनी शाखों में.......। जैसे मैं ले लेती हूं अपने में.........।

''तृतीय क्षण....।'' मैंने आश्चर्य से दोहराया-

''क्या कुछ जान सकती हूं मैं ? और तुमने स्वयं को 'तटबंध' क्यों कहा ? और तुम्हारा अतीत.........।''

मैं कुछ उलघन से उसकी तरफ देखती रही।

''हां मानसी। बतलाऊंगा तुम्हीं को। पर उससे पहले कुछ कह लूं.......।'' वह मुझे देख रहा है।

''यही सही।'' मैं मान लेती हूं। यह कुछ महत्वपूर्ण मुझसे कहना चाहता है......। मैं जानती हूं। इसी को सुनना है सिर्फ..... वह जब भी कहे.......

''याज्ञवल्क्य कहते हैं- अनुभवजन्य ज्ञान, प्रथम क्षण में उत्पन्न होता है। द्वितीय क्षण में रहता है। तृतीय क्षण में नष्ट हो जाता है। यही है, 'तृतीय क्षण ध्वंस प्रतियोगी'''

तुम्हारा भी यही मानना है ?'' मैंने पूछा और अपनी हथेलियों से उसकी आंखें ढांप दीं......

''और इस तरह मत देखो मुझे।'' उसने मेरे हाथ अपने हाथों में ले लिए-

''हमारे न मानने से क्या होता है ?....... संवेगों की तीव्रता कम होने लगे तो स्मृतियों की गर्त में जाना ही है सबकुछ।'' कहा था नारद ने व्यास से।

''तुम्हारे संवेगों की तीव्रता......।'' न चाहते हुए भी मेरी आवाज कांप गई। क्यूं सोच रही हूं मैं ऐसा ? मैंने बरजा खुद को.....।

''कभी कम न होने के लिए ही तो, पुनर्जाग्रत हुई है यह। नहीं समझोगी तुम।'' उसने उसी तरह अपने गंभीर स्वर में कहा।

मैंने एक गहरी सांस फेंकी- नहीं समझना है मुझे यह सब सिध्दार्थ.......उत्पन्न हुए हैं संवेग या पुनर्जाग्रत, मुझे क्या ? कम न हो यह तीव्रता, यही काफी है।

मुझसे रहा नहीं गया। मैंने अपनी हथेली उसके गाल पर टिकाया और उसका चेहरा समीप ला, उसका माथा चूम लिया.......।

उसका चेहरा, मेरे चेहरे के समीप है....... बिल्कुल समीप.......। उसने पलभर मुंद गईं अपनी पलकें ऊपर कीं........ मुझे देखता रहा-

''तुम्हारे सौंदर्य से भी तो अभिभूत हूं मैं मानसी। तुम्हारे 'नाभि-बिंदु' से बंधा हूं मैं। 'नाभि', जहां से बंधा है सूक्ष्म शरीर। एस्ट्रल बॉडी। सटल बॉडी।''

उसने अपना चेहरा मेरे चेहरे से सटा लिया और मेरे निकट आ..... मुझे अपनी बांहों में घेर लिया.....

''जब तुम मुस्कराती हो मानसी, तुम्हारे गालों में पड़ते हुए गढ़ों के भंवर में उलझ जाता हूं मैं। तुम्हारी आंखें, चंचल, शोख.......और तुम्हारा आग्रह से भरा हुआ, अनकहा आमंत्रण, मोहता है बार-बार..... बांध लेती हो तुम.......। बांध सकती हो तुम........।''

मैंने आंखें बंद किए हुए ही उसे अपने भीतर महसूस किया-- अनंत आकाश का कोई कोना नहीं होता। उसकी कोई सीमा नहीं। वह अनंत है। मैं अनंत में हूं।

मेरी आंखों से दो बूंद आंसू गिरते हैं उसके चेहरे पर.......।

उसने अपना चेहरा उठाया और मेरे आंसू पोंछ दिए.......।

''लेकिन मानसी, इस सबके बावजूद नर् कत्ता हो तुम। न हीर् कत्ता हूं मैं। .......और इसीलिए कहता हूं 'डेस्ंटिड' है बहुत कुछ। शकुंतला की तरह। दुष्यंत की तरह।''

''जन्मों पर विश्वास करते हो तुम ?'' मैंने अपनी भीगी आंखों से उसे देखा।

''अनुभवजन्य ज्ञान समाप्त नहीं होता मानसी। अतिशेष संस्कार के रूप में चित्त में दबा रहता है। और कारण शरीर माध्यम बनता है, संस्कारों के वाहक का........।

''जन्मों पर विश्वास करते हो तुम ?''

मैं दुबारा पूछती हूं, पर वह उसी तरह खोया-खोया सा है।

कितनी ही बार उसकी देह-तरंगों से आवृत्त हो जाती हूं मैं। ज बवह शांत होता है, मुझे खबर हो जाती है। जब वह प्रेम में होता है, उसकी देह तरंगे कुछ और ही होती हैं- और जब वह बेचैन होता है, उसकी देह-तरंगे मुझे भ्ज्ञी चैन नहीं लेने देतीं। मैं व्याकुल होने लगती हूं -

''कारण शरीर के माध्यम से प्राप्त अनुभवजन्य ज्ञान.....।''

''सिध्दार्थ। पूर्व जन्मों पर........।''

''समग्र स्पष्टता के साथ उभरकर सामने आ जाए, स्मृति पटल पर..... जीवंत बनकर 'तत्ताक स्मृति' है यह........।''

उसके माथे पर बल है।

मैंने उसके बाल बिखेर दिए। फिर उन्हें मुट्ठी में भरकर उसका चेहरा हल्के से हिलाया -

''सिध्दार्थ, पूर्व जन्मों पर, तुम्हारी इतनी गहरी आस्था का कारण.......? और यह 'तत्ताक' क्या है ?''

''चित्त की एकाग्रता, अभ्यास तथा सहचार दर्शन आदि में से कोई भी साधन प्राप्त हो जाए अगर, तो वह संस्कार, जो सुप्त होकर चित्त में पड़ा रहता है, उद्बुध्द होकर प्रकट हो जाता है। 'तत्ताक' है यह। और यह स्मृति ही अपने आपको, अपने खोयेपन को पहचानने में मदद करती है।''

वह मुझे देखते हुए कह रहा है।

कितना कम जानती हूं मैं इसे ? कुछ भी तो नहीं। मैं उसे देखते हुए सोच रही हूं - मुझे कुछ समझ में नहीं आता, जब यह ऐसी बातें करता है। सिर्फ प्रेम है, अब यह मानने को जी नहीं करता। कुछ और भी है, जो मेरे लिए रहस्य है अभी तकं कैसे जाना जा सकता है वह ? क्या है इसमें, तो इसे अतींद्रिय सत्ता के निकट ले जाकर खड़ा कर देता है। इसकी कई बातों का मरे पास कोई जवाब नहीं होता है। बहुत बार यह मेरे लिए अनसमझा रह जाता है........

''सिध्दार्थ, अपने आपको जानने के प्रयास में अक्सर 'वीतराग' की बात क्यों करते हो तुम ? क्या जरूरत है 'अभिस्नेह' की ? आसक्ति को क्यों गलत मानते हैं हम ?''

''टूटना है बंधन को....... सीमाएं टूटनी हैं, सहधर्मिता टूटेगी। हवाएं सख्त हैं मानसी। 'गहना कर्मणो गति:.......।' ''

मैंने सिहर कर उसकी ओर देखा। कैसी है उसकी आवाज ? कहां से बोल रहा है यह ? किस जन्म से ? कौन है यह ? क्यूं आया है मेरे पास ? क्यूं इसकी आवाज में समंदर की लहरों का शारे है ? क्यूं इसकी आवाज इतना उद्वेलित करती है मन को........।

मेरा मन बहुत उदास हो गया। जी चाहा, कुछ न कहूं, कुछ न पूछूं.........। उसे अपनी बांहों में छुपा लूं बस........। पर लगा, वह कुछ कहना चाहता है.......। तो मैंने ही कहा-

''वीतराग की बात अक्सर तुम क्यों करते हो सिध्दार्थ ?''

''आकाश उत्पन्न हुआ है, अत: कार्य है। आत्मन: आकाश: संभूत:।''

उसने अपनी उसी आवाज में कहा। उसकी स्वर लहरियों को अपने होठों से छुआ मैंने -

''सिध्दार्थ, 'अनभिस्नेह' की बात क्यूं करते हो तुम ?''

'' 'ऋतंभरा तत्र प्रज्ञा', निर्विचार योग के वैशारद्य काल में जो प्रज्ञा - आध्यात्म प्रसाद रूप, जो बुध्दि साधक को प्राप्त होती है - ऋतंभरा प्रज्ञा कहलाती है।''

उसकी आवाज ने मुझे घेर लिया है चारों तरफ से......... और मैं उसी से बंधी-बंधी पूछती हूं उससे-

''किसी बात का तो जवाब दो सिध्दार्थ ? आसक्ति को क्यों इतना गलत मानते हैं हम ?''

''आसक्ति गलत कहां है मानसी। 'एकाग्रता' पैदा कर जाए यह, अगर, तो 'अच्युत' हैं कृष्ण। देन यू आर द वे। आसक्त हूं मैं तुमसे.......।''

मैंने धीरे से उसकी पलकें छू लीं।

''और गलत नहीं है यह। लेकिन अगर तुम आसक्त हो मुझ पर, तो गलत हो जाता है, सबकुछ।''

उसकी पलकें स्पर्श के बोझ से कांपने लगीं।

''क्यों ? व्हाई ?''

मैं परेशान हो गई। क्यों गलत नहीं है इसके लिए आसक्ति। आसक्ति इसके लिए 'एकाग्रता' है। और मेरे लिए ? आसक्ति इसके लिए लगत नहीं है क्योंकि यह कभी नहीं जा सकता मुझे छोड़कर।

अर्जुन नहीं जी सकता कृष्ण के बगैर। वह नहीं संभाल सकता कुछ कृष्ण के बगैर और से बात कृष्ण जानते हैं.....। फिर भी उसे छोड़कर तो जाना ही था.......।

''जरूरी कहां है, हर सवाल का जवाब देना।''

'' 'तुमसे मिलने के पहले, तुमसे मिला हूं मैं, कहते हो तुम।' -क्या अर्थ है इसका ?''

मैंने कांपती आवाज में पूछा।

''एलिशा को ढूंढ़ते हैं एलिजा। अर्जुन को कृष्ण। पेत्रुस को ईसा। ढूंढ़ने वाला चाहिए। मिलना ही है वह सब कुछ जो खोया हुआ है। .......एलिजा जब ढूंढ़ने निकले.......ढूंढ़ना सप्रयास था। मिले जब एलिशा से तो पहली मुलाकात थी वह....। लेकिन क्या वास्तव में पहली मुलाकात थी ? ........फिर पहचाना कैसे ? पुकारा क्यों ?''

एक निहायत ही दूसरी आवाज में उसने कहा। ऐसी आवाज, जिसका न अतीत से कोई वास्ता है, न भविष्य से ......। सबकुछ में से निकलती एक नई आवाज-

''क्या कहकर पुकारा सिध्दार्थ ?'' मैंने उसके कंधे पकड़ लिए।

''मॉय लव। कम हिदर। तुम्हें ही ढूंढ़ रहा हूं मैं। छोड़ो सबकुछ। चलो मेरी राह........।''

वह मेरी आंखों में उतरकर मुझमें ही कुछ देख रहा है-

''छोड़ो सिध्दार्थ! क्यों मजाक करते हो ?'' मेरी आवाज में रोना भरने लगा है।

''जीवन भर मजाक करते हैं हम खुद से। अपने आप को विस्मृत कर जाना और उस विस्मृति को बनाए रखना-मजाक नहीं तो और क्या है ? बेचारा है मनुष्य.......। लेकिन मानसी, जब स्मृति हो आए अपनी, तब मौज है जीवन, आनंद है जीवन, अमरता है जीवन। पूर्ण हैं हम। समर्थ। पूर्ण समर्थ।''

कौन है यह ? मैं क्यूं कुछ भी नहीं जान पा रही ? मैं कुछ क्यूं नहीं पकड़ पा रही ? यह बार-बार इस तरह की बातें क्यूं करता है ?

मैं जानती हूं....... जब एलिजा आता है, एलिशा को ढूंढ़ते हुए, उसे कुछ देने के लिए.....। वह जानता है, एलिशा ग्यारह बैलों के साथ खेत जोत रहा है.......बारहवें बैल के स्थान पर खुद है......। और वह आकर उसे अपने साथ ले जाता है। अपने महत्त्वााकांक्षी शिष्य को........। उसकी ही महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने हेतु। यह क्यों आया है मेरे जीवन में ? कौन है ये ?

कौन हूं मैं ? क्या सचमुच पूर्व जन्म का कोई संबंध है ? जिसे ये बार-बार कहता है। मैं तो नहीं जानती यह सब। मैं तो मानती भी नहीं थी यह सब। पर इसके साथ सब कुछ मानने को जी चाहता है। क्या यह मेरी ही महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने आया है ?

यह क्यों कहता है, आसक्ति मुझे ही छोड़नी है, इसे नहीं। क्या इसका अर्थ यह नहीं कि आसक्ति उसे ही छोड़नी होती है, जो वास्तव में अपने आपको जानने को, अपने अनंत के द सेल्फ, द सेल्फ इटसेल्फ को..... द अननोएबल को....... ज्ञातव्यता के तल पर लाकर जानने को वास्तव में उत्सुक हो।

आसक्ति उसके लिए ही बंधन है। पर इसके लिए नहीं, इसके लिए आसक्ति बंधन नहीं है। मैं जानती हूं। यह किसी भी पल सबकुछ छोड़कर जा सकता है। आसक्ति एकाग्रता है इसके लिए। पूर्ण पुरूष है यह, संपूर्ण पुरूष........ निर्लिप्त...... निर्विकार........। इतनी बार छुआ इसे, पर कहां छू पाई इसे........। यह मेरी छुअन में होते हुए भी कितना असीम है ? कैसे आ गया यह मेरे जीवन में ? कैसे ?

''सिध्दार्थ....... पता नहीं, मैं तुम्हें कितना समझ पाई, जान पाई....... पर तुम सिध्दार्थ........मेरे सिध्दार्थ.......।''

आगे के शब्द खो गये आंसुओं में मेर और मैं उसके सीने से लगकर रो पड़ी........

उसके हांथ मेरे बाल सहला रहे हैं....... मैं उसके कंधे में मुंह छिपाए उसकी खुशबू में खोती जा रही हूं.......। अब कहां जाना और किसके लिए जाना ? उसने बांहें कसीं मेरे चारों तरफ, तो मैंने खुद को ढीला छोड़ दिया........।

कुछ ही लम्हें गुजरे होंगे....... अपने जिस्म पर उसकी बांहों का कसाव कम होता पाया तो सिर उठाकर उसे देखा........

कितना सूनापन भर आया है उन आंखो में, एक अजीब-सा खोयापन........ निस्सीम आकाश में टिका दो पुतलियां........जिनमें मैं अपना प्रतिबिंब देख रही हूं.......।

''मानसी। कोहरा छंट रहा है...... हल्का होता जा रहा है कोहरा.........उभरने लगे हैं दो हाथ......... हथेलियां सामने की ओर.......उभरने लगा है शरीर....... समूचा का समूचा......... देख रही हो तुम......छंटता जा रहा है कोहरा.......स्त्रोत का परिचय दिए बिना..... कहां से निकल रहा है........ कहां विलीन हो रहा है........ कहां........ और उस कोहरे में उभरता हुआ वह चेहरा......... पूरी तरह स्पष्ट है.......तुम्हारे सामने.......। देख रही हो तुम...... देख रही हो तुम....... कौन है...... वह ......कौन है वह मानसी......... ?''

खोया-खोया सा वह कहता जा रहा है। मेरी आंखे फिर भर आईं। कहां है वह ? कया होता है इसे ? मेरे पास है या कहीं और ? किसी अतीत में ? मैंने अपनी हथेलियों में उसका चेहरा लिया और उसके होंठ कसकर चूम लिए.......। शून्य में टिकी उसकी आंखे मेरे चेहरे पर आकर ठहर गईं। मैंने मुस्कराने की कोशिश की-

''सिध्दार्थ, क्या कह रहे हो तुम ? ऑर यू गॉन मैड ?''

उसने मेरी आंखो में देखा..... उसकी पुतलियों में मैंने खुद को...... एक उत्तेजना मुझमें लहर की तरह उठी और मैंने खुद पर काबू पाते हुए एक गहरी सांस बाहर फेंकी.......।

''देयर आर मेनी थिंग्स कॉमन इन यूअर सिध्दार्थ एंड अ मैड मैन......। हां मानसी, डोंट टेक इट इजी। इट इज नॉट लाइक 'ए लवर' एंड 'ए मैड मैन', नॉट इवन लाइक ए जीनियस एंड ए मैड मैन। तुम ही देख रही हो यह सबकुछ। ......कितना विचित्र है....द टाइम आबसोल्यूट.......रहस्यमय......... अनएक्सप्लेंड.......अतींद्रिय जगत् का बहुआयामी स्पर्श....... अव्याख्येय.......फिर भी दायरे के भीतर। मानसी, 'तुमसे मिलने के पहले तुमसे मिला हूं मैं।' .....इतना ही जानो इसे अभी......'एंड यू विल नो इट।' एश्योरेंस है यह। ........वीतरागी बनो। ......समझो वैराग्य को। बस। यही है पथ। मानसी, मॉय लव। मॉय लव......शुचिता हो तुम। सौंदर्य हो तुम। तुम ही हो ऋतंभरा।''

मेरी बांहों ने उसे चारों तरफ से घेरा....... और व्याकुलता, जिसे बहुत संभालकर रखा था मैंने ....... उसकी बांहो में टूटकर बिखर गई।

''सिध्दार्थ.....।'' एक बेहिस व्याकुलता से मेरे होंठ उसे जगह-जगह प्यार करने लगे.......

''मेरा राग भी तुम हो, विराग भी तुम। वीतराग भी तुम ही हो। क्यों ऐसी-वैसी बातें करते हो सिध्दार्थ, 'ऑय लव यू'....''

मैंने पहली बार ........पहली बार अपने होठों से वह शब्द कहे, जो मैं हजार-हजार बार कह चुकी थी....... अपनी आंखों से, अपने होठों से ........ अपने समूचे अस्तित्व से.....। और कहते ही मैंने अपना चेहरा उसके कंधे में छुपा लिया.......। उसने मुझे अपनी बांहों में लपेट लिया.......।

और बहुत देर बाद उसने मेरा चेहरा अपने सामने कर लिया......... उसके होठों पर उज्जवल मुस्कान है....... जिसे में छूती नहीं, देखती हूं सिर्फ ......

''ऑय एडमायर इट। मैं इस प्रेम की उपासना करता हूं मानसी।''

उसने मेरे माथे पर बिखर आए बालों को पीछे किया-

''स्वभाव है वीतराग। प्रेम में हैं हम, इसलिए हैं.....वीतराग। .......मानसी, 'प्रसन्न चेतसो हयाशु: बुध्दि: पर्यवतिष्ठते।' ......प्रसन्न हुआ चित्त ही, परम आनंदित चित्ता ही, वीतराग को प्राप्त होता है। .......जो व्यक्ति पूर्णता के करीब होता है, आनंद से संपृक्त होता है जो, वही तो आबसर्वर होता है न.......।''

बहाव है वह , तीव्र बहाव और कभी किसी क्षण उसके साथ बहते हुए मैं पाती हूं.....बाहर  की सारी आवाजें लुप्त हो गई हैं......सिर्फ उसके शब्द हैं....जो एक खास वर्तुल बनाते हुए अंतरिक्ष में तैर रहे हैं.....और हृदय की धड़कन जो, उससे उठकर आती है ओर मुझमें गिरकर खो जाती है.....किसी तेज गति से गिरने वाले झरने की तरह.....और मुझे झरने के शोर के अवाला कुछ और सुनाई नहीं देता।

''क्या है यह वीतराग?''

 कभी-कभी यह भी याद रखने में दिक्कत होती है कि यह मैं हूं जो प्रश्न पूछ रही हूं, और यह वह है जो उत्तार दे रहा है। इतनी भी दूरी असह्य लगती है किसी क्षण..... जी चाहता है.... उसी में गिरकर विलीन हो जाएं और खत्म हो जाए यह प्रश्न और उत्तार का सिलसिला.....

''जानते कहां हैं हम? स्वभाव है यह? ऐसा स्वभाव, जिसे हम भूल चुके है।''

उसके चेहरे पर बच्चों की -सी अबोधता है। उसकी आंखों में एक उदास चमक है....जो उस क्षण उतनी ही शाश्वत लग रही है, जितनी वृक्षों की फुनगियों पर टिकी धूप..... कहीं-न कहीं व होती जरूर है.... बस कभी-कभी वह हमारी टोहती आंखों से परे होती है....तब भी इम उसे अपने भीतर महसूस करते रहते हैं....

''क्या कोई अपना स्वभाव भी भूल सकता है सिध्दार्थ?'' मैं उस चमक से अपनी आंखें नहीं हटा पा रही.....।

''यही तो दिक्कत है। मनुष्य अपना स्वभाव भूल चुका है और यह भी भूल चुका है कि वह अपना स्वभाव भूल चुका है।...... सृष्टि की अधिकांश गड़बड़ सिर्फ इसलिए है....।''

वह मुझे देख रहा है। देख रहा है मेरे देखने को। मेरी वयाकुलता, मेरा पागलपन, कुछ भी तो नहीं छिपा पा रही मैं इससे..... पर जरूरत कहां है? चाहूं भी तो नहीं कर सकती ऐसा। यह मुझे मुझसे ज्यादा जानता है ....

''तो मनुष्य का स्वभाव है वीतराग....।'

मैंने कहने के लिए कहा, ओर असह्य बेचैनी से अपना सिर झुका लिया।

''हां....।'' उसने मेरा चेहरा अपनी हथेलियों में भरा और ऊपर उठाया-

''मेरी आंखों की पुतलियों में कई बार गहराई से उतरती रही हो तुम....''

मैंने चौंककर उसे देखा ओर देखती रही-

''उतरती रहती हो, बार-बार, इन आंखों की पुतलियों में। क्या ढूंढ़ती हो वहां? जानती हो, वहां कौन है??....और जो है,.....वही है, मेरा 'स्थितिपद'।..... कैसे रिझाया जाए उसे? कैसे? कि बन सके वह वीतरागी। पा सके, अपने ही आपको।''

मुझे कुछ समय में नहीं आया। मेरे गालों पर उसकी हथेलियों का स्पर्श है..... और मैं उस स्पर्श का एक गहरा घूंट भरती हूं.... मैं कुछ कहना चाहती हूं.... कुछ ऐसा..... जिसका संबंध सिर्फ मुझसे है....। कुछ शब्द मेरे अंदर वर्तुल बनाते हुए-से घूम रहे हैं.... और मैं समझ नहीं पा रही.....ये वे शब्द हैं, जो मैं महसूस कर रही हूं, या वे, जो मैं सोच रही हूं, या वे जो मैं कहना चाहती हूं....कब से....

''सिध्दार्थ, ऑय डोंट इंटेंड एनथिंग। एनीमोर। आसक्त हूं तुम पर। होना ही है। आसक्त हुई मैं। गर्व है यह। अभिमान मेरा.....।'' मेरे कांपते होठों से यही शब्द निकलते हैं.....। मैं उन्हें सुनती हूं ओर कोई फैसला नहीं कर पाती...।

''पगली....।'' वह अपनी हथेलियां कसता है मेरे चेहरे पर--

''द मोस्ट इंटीमेट एज यू आर। लेट यू नो। मॉय डबल डी। लेट यू नो। आसक्ति अभियान बन जाए जब, 'ईश्वर प्रणिधान' है यह।''

वह मुस्कराता है। मैं उसकी मुस्कान को अपनी पलकों में भर लेती हूं....। मैं कहना चाही हूं उससे...सिध्दार्थ, आज तक तुमने जाने क्या-क्या कहा मुझे....और जोन क्या और कितना समझी मैं। पर यह जो तुमने 'पगली' कहा मुझे। यह बिल्कुल ठीक शब्द है मेरे लिए....जो अब जाकर तुम्हारी समझ में आया है.....

''ईश्वर प्रणिधान। डबल डी। व्हाट यू मीन।''

''पवर्त श्रृंखलाओं के उच्चतम शिखर का अंतिम बिंदु, गहरी से गहरी घाटियों का वह आखिरी गहरा तल। दोनों की व्यथा एक। दोनों के आनंद अकूत।.....अनडिफाइनेबल। अनफेथोमेबल। ....गहनतम आसक्ति ही अनासक्त योग है। ....हाउ, ऑय टु एक्सप्लेन। अनासक्त योग ही, गहनतम आसक्ति है .... 'तस्य वाचक: प्रणवत:'। ....पूछना मत, इसका अर्थ। समर्थ नहीं हूं मैं......।''

क्या कह रहे हो तुम सिध्दार्थ, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा। मैं कुछ पकड़ नहीं पा रही .... जो कह रहे हो तुम, क्या वह मेरे लिए है? तुम्हें क्यों लगता है ऐसा कि मैं......। क्या है मुझमें जो तुम देख पा रहे हो..... कौन हो तुम? क्यों आए हो मेरे जीवन में? मेरी आंखें भर-भर आती हैं..... मैं रोकती हूं अपने आपको.... वह उतरता जा रहा है मुझमें..... कितना मुश्किल है...... उसके सामने अपने होश में रहना..... अपने गालों पर टिकी उसकी हथेलियों कमो कसकर थामा हुआ है मैंने--

''मानसी, हमारा प्रेम साध्य भी है और माध्यम भी। न साध्य है यह, न माध्यम।''

''सिध्दार्थ.......।'' मैं उसकी आंखों में देखती रही। मैं कहीं भी रहूं, इन आंखों की रोशनी हमेशा मुझ पर रहेगी, उस क्षण मैंने सोचा।

''एक खास डायमेंशन है, जहां प्रेम है माध्यम और जहां प्रेम है माध्यम, वहां उपलब्ध होता है वीतराग। यही न। ...यही कुछ कहना चाह रहे हो न तुम.....।'' मैं बहुत संभलकर कहती हूं।

''हां, यही है। यही। अद्वितीय है यह। 'डियरेस्ट' है यह....।''

वह उतरता ही जा रहा है मुझमें। और मैं अभी भी होश संभाले हुए हूं....आश्चर्य होता है खुद पर....।

''और सिध्दार्थ, एक खास डायमेंशन है, जहां प्रेम है साध्य और उपलब्ध होता है स्थिति पद। यह भी कहना चाह रहे हो तुम....।''

तुम्हें आज ही सबकुछ समझ लेना है मानसी या कुछ कल के लिए भी रहने देना है.....मैं खुद से कहती हूं....।

''हां, यह भी । यही । अनिर्वचनीय है यह। 'डिवाइन' है यह।''

मुझे मुश्किल हो रही है खुद को संभालने में, पर कहीं-न-कहीं संभली ही हुई हूं, तभी पूछ रही हूं यह सब--

''लेकिन सिध्दार्थ। क्या है स्थिति पद? और फिर....' न साध्य है, न माध्यम'....क्या तात्पर्य है तुम्हारा?''

''मानसी, जहां न साध्य है यह, न माध्यम 'डियरेस्ट डिवाइन' है तब।''

वह अपना चेहरा समीप ले आया मेरे चेहरे के.....। सबसे पहले अपने होठों से उसकी नाक छुई मैंने....। उसकी गंध नशे के सुरूर की तरह मुझमें भरने लगी। अभी होश बाकी है जरा-सा... मैं अपने होश का इम्तहान लेती हूं.....

''और स्थिति पद?-''

''कुछ कहूं, अब भी?'' वह अपना चेहरा और समीप लाता है....।

उसके होंठ मेरे होठों से सिर्फ एक लम्हे की दूरी पर हैं.....

''हां सिध्दार्थ, कहो.....।'' मैं कहती हूं....। अब पार भी कर लो यह दूरी, कितनी सदियां और लगेंगी कि खो ही दूं मैं अपने आपको और कुछ भी बाकी न रहे सिवाय तुम्हारे ....कुछ भी नहीं.... सिध्दार्थ..... मेरे सिध्दार्थ....।''

''कहूं....कुछ.....?''

''कहूं ......मानसी......।''

''सि...ध्दा....र्थ.....।''

''मानसी, यू आर मॉय डियरेस्ट डिवायन 'डबल डी'....'' पूरे वर्ग से गिरती हूं मैं उसमें और खो जाती हूं उसी में.....। कौन गिरा? कौन खोया? पता नहीं? कई बार जब तुम मेरे सामने होते हो, मैं तुम्हें अपने अंदर और बाहर हर जगह महसूसती हूं.....। मैं देखती हूं तुम्हें.....तुम्हारा माथा, तुम्हारे होंठ, तुम्हारे बाल, तुम्हारा जिस्म, तुम्हारे जिस्म की त्वचा.... तुम्हें छू लेने की अदम्य कामना से थरथराती मरी उंगलियां....। तुम्हारी देह से, तुम्हारी आंखों से उठती तरंगें मुझ तक आती हैं, और मैं सिहर-सिहर जाती हूं.....। यह सुख है। हां, यह सुख है। तुम्हारे पास होने का सुख....तुम्हें सांस-सांस जीने का सुख.....तुम्हें सांस-सांस पाने का सुख.....। यह कितनी बड़ी और रहस्यमय बात है  कि इस समूची सृष्टि में इस वक्त तुम सिर्फ मेरे पास हो। क्या हम कभी भी उस अतींद्रिय सत्ता का वह रहस्य जान सकते हैं, जिसके लिए उसने हम दोनों को मिलाया है। इस तरह और इतना नजदीक मैंने सुख को कभी नहीं महसूसा.....जितना तुम्हारे साथ। हवा में लहराती हुई तुम्हारी गंध जब मुझ तक आती है.....मैं उसे अपनी सांसों में भर लेती हूं। किसी क्षण जब तुम बोलते हो और मैं तुम्हें देखती हूं सिर्फ.....मोहाविष्ट-सी....तो सोचती हूं , तुम नहीं जान पाओंगे....मैं तुम्हें किसी तरह लम्हा-लम्हा जी रही हूं। मैं जब देखती हूं कहीं और, सोचती हूं कुछ और....और जब तुम मुझे देखते हो, मैं बगैर तुम्हें देखे भी जानती हूं, तुम मुझे देख रहे हो....। तब मेरे महबूब। मैं भी क्या जान सकती हूं कि तुम भी किस तरह जी रहे हो मुझे? तुम जो इतने नामों से मुझे पुकारते हो। तुम जो इतनी जगहों पर रख-रख कर मुझे देखते हो.....। तुम जो इस तरह छूते हो मुझे कि समूची सृष्टि के कण-कण में मुझे विाय तुम्हारे कुछ दिखाई नपहीं देता.....। तब भी मेरे महबूब, मैं हंसती हूं तो सोचती हूं, यह प्रेम है। मैं रोती हूं तो सोचती हूं, यह प्रेम हैं कितना कठिन है.... कितना कठिन है, इस अहसास को अपने भीतर जीते हुए चलना..... कभी इतना चलती हूं और तुम्हें छू तक नहीं पाती। कभी एक कदम उठाती हूं और सीधे तुम्हारी बांहों में आ गिरती हूं। कभी इतनी असह्य बेचैनी कि लगता है, सांस तक नहीं आ रहा और कभी इतनी छलछलाती खुशी कि पागल हो जाने को जी चाहता है। कभी तुम्हारे आंखों के गर्म इरादे मुझे अपनी जगह पर खड़ा नहीं रहने देते। कभी मेरी थरथराती उंगलियों का पागलपन तुम्हारे चेहरे को ही ढूंढ़ता रहता है। यह प्रेम है। हां, यह प्रेम है। मैंने अपने आपसे कहा और रो पड़ी।

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''वीतराग स्वाभाव है। ऑय डू अंडरस्टैंड। समझ सकती हूं यह। उपलब्ध होना ही है यह।'' मेरा सिर उसकी गोद में है। वह अपनी उंगलियों से मेरे उलझे बालों को सुलझा रहा है आहिस्ता-आहिस्ता....।

जब तुम मेरे बालों में उंगलियां उलझाये मुझसे बातें करते हो, तो तुम्हें क्या लगता है मेरे सिध्दार्थ, यह सब मैं समझ पा रही हूं और इससे क्या सबकुछ जाना जा सकता है? मैं तब तुम्हारी उंगलियों का स्पर्श और तुम्हारे होठों को अपने होठों  से छू लेने की कामना मन में लिए तुम्हें देखा करती हूं। मैं देखती हूं, हवा कैसे कभी तेज, कभी धीमी गति से तुम्हारे बालों को स्पर्श कर रही है। हवा के उस स्पर्श में मेरी सांसों की पागल महक क्या तुम तक पहुंच रही है मेरे सिध्दार्थ? क्या तुम बोलते हुए किसी पल जान पाते हो कि मैं हूं ही नहीं तुमसे बाहर......। मैं तुममें ही कहीं, तुम्हारी ही इच्छा बन महक रही हूं। शब्द तुम्हारे होठों पर होते हैं और मेरे होठों की मौजूदगी पकड़ पाते हो सिध्दार्थ?

''हां।'' वह मुझे ही देख रहा है--

''और, जितनी जल्दी उपलब्ध हो जाए यह, उतनी ही आसानी से जान सकोगी तुम, अपने आपको।''

मान लो मेरे सिध्दार्थ कि कभी मैंने खुद को जान ही लिया.... जैसा कि तुम कहते हो हर बार, तो क्या वह पल, इस पल से बड़ा और महान होगा, जिस पल मैं तुम्हारे साथ होती हूं और तुम्हारी पागल बांहें मुझे क्षण भर को भी नहीं छोड़ना चाहतीं.....

''वैराग्य की बातें करते हो तुम। आखिर फर्क क्या है, वीतराग ओर वैराग्य में?'' मैं उसके होठों को अपनी उंगली से छूती हूं तो वह बहुत आहिस्ता से मेरी उंगली चूम लेता है।

''वैराग्य साधन बनता है, वीतराग के लिए। ओर वीतराग साधन है, 'तत्ताक' के लिए.......। प्रयास है वैराग्य, स्वाभाव है वीतराग।''

''कैसा प्रयास?''

मैं उसकी आंखों में उतरकर उसे देखती हूं .... यह जो जमाने भर का दर्शन तुम मुझे समझा रहे हो सिध्दार्थ मेरे, क्या तुम्हें लगता है, मैं वह सब सुन रही हूं और मेरी समझ में भी आ रहा है? किसी-किसी वक्त तो मुझे कुछ भी सुनाई नहीं देता सिध्दार्थ, मैं सिर्फ कांपते हुए तुम्हारे होंठ देखती हूं और सोचती हूं कि कब तुम यह सब बंद करो और कहो मानीस, तुम ये हो, वो हो.....

''हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्या पिहितं मुखमं।.....मानसी, संसार के कृत्रिम आकर्षण में आवत्त है सत्य। ढंका हुआ है परम अर्थ।.....मन यह समझा सके। अपने आपको

क्या तुम समझ पा रहे हो सिध्दार्थ, कि यह सत्य, जो तुम्हारे सामने है......और तुम ख्वाहमख्वाह उससे आंखों चुरा रहे हो......तो सिध्दार्थ, कहीं तुम खुद से ही तो आंखें नहीं चुरा रहे......

''इज इट पॉसिबल, संभव है क्या? आसान है यह?''

मैं उसके गले में अपनी बांहें डाल देती हूं। उसे नीचे झुकाती हूं...... और जरा-सी उठकर उसके गले की फड़फड़ाती नस चूम लेती हूं ....। उसकी आंखों में एक समंदर लहराता है--

''संसार मिथ्या है, माया है....ब्रह्य सत्य, जगत् मिथ्या.....कहते हैं शंकर......और एक बार समझा दिया जाए मन को......चित्त में भर दिया जाए जगत् मिथ्या का यह बोध, स्व सम्मोहित कर लिया जाए खुद को, जरूरत कहां है तब वैराग्य की। रह कहां जाता है राग। ...... तो यह एक एप्रोच है।

आचार्य शंकर का एप्रोच। अद्वैत है जहां सबकुछ। विशिष्ट कुछ भी नहीं। जुगल नहीं है। मानसी, नागार्जुन का शून्यवाद कह लो या शंकर का अद्वैत या 'नीत्शे का निहिलिज्म', एक ही है एप्रोच.....।''

''क्या तुम भी ऐसा ही मानते हो सिध्दार्थ?''

उसने कसकर मुझे अपने सीने में लगा लिया। असीम आहृाद से भरकर मैंने अपनी आंखों बंद कर लीं--

''नहीं, नहीं मान सकता। नदी सागर से मिलने के लिए नहीं होती मानसी। निकलती भी नहीं है वह किसी पहाड़ से। अपने होने से निकलती है नदी। अपने होने में ही वापस होती है यह। अस्तित्व है नदी....।''

जानती हूं मैं, तुम वही मानोगे जो मैं मानती हूं। मानसी के लिए सबकुछ मानोगे तुम। इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन किससे मिलता है? कोई भी आए, कहां क्या फर्क पड़ता है मेरे महबूब.....

उसका चेहरा अपने हाथों में लेकर उसकी पलकें चूम लेती हूं मैं......

''हम मिलते हैं सिध्दार्थ कई जगह।''

''मिलते हैं हम? व्हाट यू मीन? हैं ही हम 'कोनर्वा'?''

''कोनर्वा?'' मैंने हंसकर उसे देखा.....

संसार में, समूचे ब्रह्यांड में वही तो सबसे सुंदर शब्द होते हैं न मेरे सिध्दार्थ, जिनसे तुम बुलाते हो मुझे.....खुद को जान लेना इस प्रेम से बड़ा तो नहीं होगा न। तुम्हारा बोलना इतना मोहक होता है सिध्दार्थ कि अपने आपको जानने का आग्रह तुम्हारे बोलने का बहाना तो नहीं है मेरे लिए.....?

''ओ। ऑय एम सॉरी। मानसी, आश्चर्य, हो सकता है, लेकिन सत्य यह है....सागर मिलता है नदी से। सागर बनता ही नदी से है।''

उसकी आंखों में जुनून है, दीवानगी है......

मैं प्रतीक्षा करती हूं ..... ज बवह जुनून ..... वह दीवानगी बरसेगी मुझ पर.......

''और शंकर का एप्रोच। और उपनिषदों की धारणा।'' मैं मुस्कराती हूं।

''कौनर्वा है सबकुछ....।''

''कोनर्वा?''

''हां मानसी हां। धारर्णकत्ता ही धारण करता है। तुमने धारणा की और तुमने धारण किया।''

''क्या? बट व्हाट???''

'' 'एंड दिस व्हाट इज द ग्रेटेस्ट प्लेजर।' तुम हो। आसक्ति है। और यही है सत्य। परम अर्थ है यह। विशिष्ट है सबकुछ। जुगल-प्रबल.....।''

''जुगल-प्रबल?''

मैंने पूछा ही था कि फिर उस तूफान में खो गए मेरे शब्द......

     

       जया जादवानी
सितम्बर 1, 2007

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