मुखपृष्ठ  |  कहानी कविता | कार्टून कार्यशाला कैशोर्य चित्र-लेख |  दृष्टिकोण नृत्य निबन्ध देस-परदेस परिवार | फीचर | बच्चों की दुनिया भक्ति-काल धर्म रसोई लेखक व्यक्तित्व व्यंग्य विविधा |  संस्मरण | सृजन स्वास्थ्य | साहित्य कोष |

 

 Home |  Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | FeedbackContact | Share this Page!

 Click & Connect : Prepaid International Calling Cards 

You can search the entire site of HindiNest.com and also pages from the Web

Google
 
चैनल्स  

मुख पृष्ठ
कहानी
कविता
कार्यशाला
कैशोर्य
चित्र-लेख
दृष्टिकोण
नृत्य
निबन्ध
देस-परदेस
परिवार
फीचर
बच्चों की दुनिया
भक्ति-काल धर्म
रसोई
लेखक
व्यक्तित्व
व्यंग्य
विविध
संस्मरण
सृजन
स्वास्
थ्य
साहित्य कोष
 

   

 

 

प्रश्न का पेड

मैं ने माँ की शादी के फोटो देखे थे तब कितनी खिलखिलाती थी, सुन्दर और खुशनुमा थीअब! पिता से गालियाँ खाती, चुपचाप बिसूरती है, मुसे हुए कपडों में, उलझे बालों में दिन गुजार देती है, और बच्चों की माँओं की तरह ज़रा भी सुघड नहींलोग कहते हैं, बेमेल विवाह का नतीजा हैआए दिन पिता की प्रताडनाओं ने उसे बुझा दिया हैवह अकेले रहती है, किसी से मिलना न जुलना

सहसा मैं ने एक दिन माँ के चेहरे पर शादी की फोटो वाली चमक देखीउस दिन वह खाने पर आया था मैं स्कूल जाती बच्ची थीतब पहली बार प्रश्न एक अंकुर की तरह मेरे चेहरे पर उगा। माँ ने लपक कर मेरा चेहरा चूम लिया

अब माँ घर साफ रखती, अच्छा खाना बनातीकभी-कभी सजती भीअब वह पिता की उपस्थिती में अकसर आने जाने लगामैं बडी हो रही थी साथ ही चेहरे पर उगे प्रश्न पर पत्तियाँ उगने लगी थीं

भोली माँ चतुर हो गयी थीस्वयं के सुख के छिपे स्त्रोत में तृप्ति ढूंढ वह पिता को सहन करना, खुश रखना सीख गई थीबडी चतुरता से अपनी मर्यादा ओढे रखतीवह सामाजिक हो गईअब वह पिता की अनुपस्थिति में भी आतामेरे चेहरे पर उगे प्रश्न के पेड पर फूल उग आए थे वह बडा हो गया थावे फूल मुझे सुन्दर लगते उनके मोह में मैं माँ की शिकायत पिता से कभी नहीं करती। माँ मुझे सुन्दर फ्रॉक्स दिलातीवह चॉकलेट्स से हाथ भर देता पर प्रश्न का पेड था कि बढता जाता

अब वे शहर से बाहर मिलतेमैं किशोर वय में आ गई थी मैं माँ से दुर्वव्यवहार करतीवह आता तो जलती आँखों से देखतीपर पिता से शिकायत करने का साहस न जुटा पातीप्रश्न के पेड पर ना जाने कहाँ से नीम कडवे फल उग आये थे

अब उनके मिलने पर लोग कानाफूसी करने लगे थेमैं किशोरी से युवति हो गई थीकडवे फल तो झड ग़ये थे पर मेरा पूरा चेहरा प्रश्न के पेड से ढक गया थामैं कहीं दिखाई नहीं देती। माँ को मेरी चिन्ता हुई उसी रात माँ ने देर रात तक बात की जिसका सार था कि  मेरे मरुस्थल से जीवन में वही एक हरा-भरा कोना हैऔर है ही क्या मेरे जीने की वजह तू या वहमैं कुछ समझी, कुछ नहीं

माँ ने खूब खोज-बीन कर मेरी सगाई एक सुयोग्य व्यक्ति से कर दीहम दोनों मिलते और प्रेम के असर से मेरे चेहरे पर उगे प्रश्न के पेड क़े पत्ते झडते जातेविवाह कर और पति से प्रेम और सम्मान का अथाह सागर पा कर लोटी तो माँ ने पाया वह पेड ज़ो मेरे चेहरे पर उगा था ठूंठ हो गया है

अंतत: जब स्वयं माँ बनी तो पाया वह पेड ज़ड से उखड ग़या है और मेरा चेहरा माँ की खिलखिलाती फोटो सा हो गया है मैं समझ गयी थी माँ के मरुस्थल और हरे-भरे कोने का रहस्यफिर कभी मेरे चेहरे पर प्रश्न का पेड नहीं उगा

मनीषा कुलश्रेष्ठ

     

इन्द्रनेट पर हलचल - सुब्रा नारायण
अपने अपने अरण्य - नंद भारद्वाज
चिडिया और चील - सुषम बेदी
ठठरी - हरीश चन्द्र अग्रवाल
प्रश्न का पेड - मनीषा कुलश्रेष्ठ
बुध्द की स्वतंत्रता - मालोक
भय और साहस - कनुप्रिया कुलश्रेष्ठ
मदरसों के पीछे - रमेशचन्द्र शुक्ल
महिमा मण्डित - सुषमा मुनीन्द्र
विजेता - सुषमा मुनीन्द्र
विश्वस्तर का पॉकेटमार- सधांशु सिन्हा हेमन्त
शहद की एक बूंद - प्रदीप भट्टाचार्य
सम्प्रेषण  - मनीषा कुलश्रेष्ठ
सिर्फ इतनी सी जगह - जया जादवानी

कहानियों का पूरा संग्रह

Hindinest is a website for creative minds, who prefer to express their views to Hindi speaking masses of India.

             

मुखपृष्ठ  |  कहानी कविता | कार्टून कार्यशाला कैशोर्य चित्र-लेख |  दृष्टिकोण नृत्य निबन्ध देस-परदेस परिवार | बच्चों की दुनिया भक्ति-काल धर्म रसोई लेखक व्यक्तित्व व्यंग्य विविधा |  संस्मरण | सृजन साहित्य कोष |
प्रतिक्रिया पढ़ें! |                         प्रतिक्रिया लिखें!

HomeBoloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | FeedbackContact

(c) HindiNest.com 1999-2015 All Rights Reserved. A Boloji.com Website
Privacy Policy | Disclaimer
Contact : manishakuls@gmail.com